भारतीय संसदीय इतिहास में 16 अप्रैल 2026 की रात एक ऐसे सियासी मोड़ के रूप में याद की जाएगी, जहां शतरंज की बिसात संसद के भीतर बिछी थी। एक तरफ सदन में परिसीमन और महिला आरक्षण के नए विधेयकों पर तीखी बहस चल रही थी, तो दूसरी तरफ सरकार ने चुपचाप एक नोटिफिकेशन जारी कर 2023 के पुराने महिला आरक्षण कानून को लागू कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि 'रूल 66' के तकनीकी पेंच और विपक्ष की एकजुटता से पैदा हुए खतरे को टालने के लिए सरकार द्वारा चला गया एक 'सुरक्षात्मक दांव' है।
क्या है 'रूल 66' और क्यों फंसा बिल का पेंच
संसदीय कार्यप्रणाली का 'रूल 66' एक जटिल तकनीकी प्रावधान है। यह तब लागू होता है जब एक विधेयक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर हो। सरकार ने महिला आरक्षण और परिसीमन को एक ही 'पैक' में पेश किया था। इसका मतलब था कि अगर परिसीमन का विरोध हुआ और बिल गिरा, तो महिला आरक्षण का नया संशोधन भी अपने आप खत्म हो जाता।
विपक्ष ने इसी पेंच को पकड़ लिया और परिसीमन को 'दक्षिण विरोधी' बताकर बिल को गिराने की रणनीति बना ली। जब सरकार को अपनी हार का अहसास हुआ, तो उसने 'रूल 66' को दरकिनार करने के लिए आधी रात को पुराने कानून का नोटिफिकेशन जारी कर दिया।
मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक: पुराने कानून को क्यों बनाना पड़ा कवच?
कानूनी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सरकार को डर था कि अगर नया बिल संसद में गिर गया, तो तकनीकी रूप से 2023 वाला मूल महिला आरक्षण कानून भी अधर में लटक सकता था। राष्ट्रपति की मंजूरी के बावजूद 3 साल से उसकी अधिसूचना जारी नहीं हुई थी। सरकार ने इसे 16 अप्रैल से प्रभावी घोषित कर इसे 'संविधान का हिस्सा' बना दिया है।
अब यदि नया विधेयक (850 सीटों वाला) शुक्रवार को संसद में फेल भी हो जाता है, तो कम से कम 2023 वाला मूल कानून सुरक्षित रहेगा और विपक्ष यह नहीं कह पाएगा कि सरकार ने महिलाओं का हक छीन लिया।
एनडीए के लिए 'नंबर गेम' बना बड़ी चुनौती
संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए सदन में 'विशेष बहुमत' यानी दो-तिहाई सांसदों का समर्थन अनिवार्य है। यहाँ गणित एनडीए के खिलाफ जाता दिख रहा है। 540 सदस्यों वाली लोकसभा में बिल पास कराने के लिए कम से कम 360 वोटों की दरकार है, जबकि एनडीए के पास फिलहाल केवल 293 सांसद हैं।
यानी सरकार को 67 और सांसदों के समर्थन की जरूरत है। विपक्ष की ओर से अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी की आक्रामक घेराबंदी ने निर्दलीय और छोटे दलों को भी सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिससे एनडीए के लिए राह मुश्किल हो गई है।
विपक्ष का तीखा हमला: "हार स्वीकार कर चुकी है सरकार"
कांग्रेस और सपा ने सरकार के इस 'मिडनाइट एक्शन' को उसकी 'नैतिक हार' बताया है। प्रियंका गांधी ने कहा कि जिस तरह से जनगणना और परिसीमन की आड़ में राजनीति की जा रही है, वह महिलाओं के साथ धोखा है।
वहीं विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को पता चल गया है कि उसके पास नंबर नहीं हैं, इसलिए वह आधी रात को नोटिफिकेशन जारी कर 'सेफ एग्जिट' ढूंढ रही है।
मनीष तिवारी जैसे कानूनी जानकारों ने सवाल उठाया कि जब मामला संसद के अधीन था, तो कार्यपालिका ने अधिसूचना जारी करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई?
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने साफ कर दिया है कि इन विधेयकों पर शुक्रवार शाम 4 बजे वोटिंग होगी। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि क्या प्रधानमंत्री मोदी कोई नया 'चमत्कार' करेंगे और 67 सांसदों का समर्थन जुटा पाएंगे, या फिर आधी रात को लागू किया गया 2023 का कानून ही इस विशेष सत्र की एकमात्र उपलब्धि बनकर रह जाएगा।