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Lok Sabha Speaker No Confidence Motion: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई की अगुआई में यह प्रस्ताव लोकसभा सचिवालय को सौंपा गया। इस कदम के साथ 118 सांसदों ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर समर्थन जताया है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस प्रस्ताव में फिलहाल विपक्ष के साथ खड़ी नजर नहीं आ रही है। नोटिस मिलने के बाद खुद स्पीकर ने सचिवालय को इस पर तेजी से जांच करने और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

विवाद की जड़ क्या है?
विपक्ष का आरोप है कि सदन के अंदर उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। हाल ही में राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान पूर्व सेना प्रमुख एम एम नरवणे के संस्मरण से जुड़े मुद्दे उठाने की अनुमति नहीं मिली थी। इसके साथ ही आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन और सदन में बोलने का पर्याप्त मौका न मिलने को लेकर भी विपक्ष नाराज है। विपक्षी दलों का कहना है कि सत्तापक्ष को खुली छूट दी जा रही है जबकि विरोधियों के माइक बंद किए जा रहे हैं।

संविधान में क्या है स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) और लोकसभा कार्यप्रणाली के नियमों के तहत स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा सचिवालय को 14 दिनों के भीतर चर्चा के लिए तारीख तय करनी होती है। यदि सदन में पूर्ण बहुमत (सदन के तत्कालीन सदस्यों का बहुमत) के साथ यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तभी स्पीकर को उनके पद से हटाया जा सकता है।

इतिहास में अब तक तीन बार आए ऐसे प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास में यह चौथी बार है जब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई है। सबसे पहले 1954 में जीवी मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव आया था, जो खारिज हो गया। इसके बाद 1966 में हुकम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया, लेकिन पर्याप्त सदस्यों का समर्थन न होने के कारण वह गिर गया। तीसरी बार 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था, जिसे बहस के बाद सदन ने अस्वीकार कर दिया था। अब देखना यह होगा कि ओम बिरला के मामले में सदन का रुख क्या रहता है।