बीजेपी ने अपनी 'विनेबिलिटी' रणनीति के तहत दूसरे दलों से आए कद्दावर नेताओं को सत्ता की चाबी सौंपी है। ऐसे कई बड़े नाम हैं जिन्होंने अपनी मूल पार्टी छोड़कर बीजेपी में सर्वोच्च पद हासिल किया है।

भारतीय राजनीति में बीजेपी को कभी अपनी विचारधारा के प्रति बेहद सख्त माना जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में पार्टी ने 'राजनीतिक समावेश' की नई इबारत लिखी है। आज बीजेपी में कई ऐसे चेहरे शीर्ष पदों पर काबिज हैं, जिनका सियासी सफर कांग्रेस, आरजेडी या अन्य क्षेत्रीय दलों से शुरू हुआ था। सम्राट चौधरी से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा तक, बीजेपी ने इन नेताओं की राजनीतिक क्षमता को पहचानते हुए उन्हें सीधे सत्ता के सिंहासन पर बैठाया है।

​सम्राट चौधरी: बिहार के नए 'सम्राट' 
​बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का उदय सबसे चौंकाने वाला रहा है। आरजेडी से अपना सफर शुरू करने वाले सम्राट चौधरी, राबड़ी देवी सरकार में मंत्री रहे और फिर जेडीयू के रास्ते 2017 में बीजेपी में शामिल हुए। बीजेपी ने उनके ओबीसी (OBC) चेहरे और आक्रामक राजनीति को देखते हुए उन्हें पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाया और अब बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई है। वे बीजेपी के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिनका बैकग्राउंड संघ या बीजेपी का नहीं है।

​हिमंत बिस्वा सरमा: पूर्वोत्तर के चाणक्य 
​असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा आज बीजेपी के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार हैं। 2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए सरमा, कभी तरुण गोगोई सरकार में कद्दावर मंत्री थे। बीजेपी ने उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए 2021 में उन्हें असम का मुख्यमंत्री बनाया और अब 2026 के चुनाव भी उन्हीं के चेहरे पर लड़ रही है।

​पेमा खांडू: अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी का बड़ा चेहरा 
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी अपना सफर कांग्रेस से शुरू किया था। उनके पिता दोरजी खांडू भी कांग्रेस के सीएम रहे थे। 2016 में पेमा खांडू कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए और तब से लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनकर राज्य की कमान संभाल रहे हैं।

​एन बीरेन सिंह: मणिपुर में बदला सियासी मिजाज 
​मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का बैकग्राउंड भी गैर-बीजेपी रहा है। उन्होंने अपनी पारी 'डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी' से शुरू की और फिर कांग्रेस में मंत्री रहे। 2016 में कांग्रेस छोड़ने के बाद बीजेपी ने उन्हें 2017 और फिर 2022 में मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी।

​डॉ. माणिक साहा: त्रिपुरा में कांग्रेस से सीएम तक 
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा ने 2016 में कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी जॉइन की थी। पार्टी ने उनकी साफ-सुथरी छवि को देखते हुए पहले प्रदेश अध्यक्ष और फिर 2022 में मुख्यमंत्री बनाया। 2023 के चुनाव जीत कर वे दोबारा सत्ता के शिखर पर बैठे हैं।

​अर्जुन मुंडा: झारखंड मुक्ति मोर्चा से बीजेपी की कमान 
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा मूल रूप से 'झारखंड मुक्ति मोर्चा' (JMM) से थे। 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद वे बीजेपी में आए और 2003 में राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। पार्टी ने उन्हें कई बार राज्य की कमान सौंपी और केंद्र में भी अहम जिम्मेदारी दी।

​ब्रजेश पाठक: यूपी के डिप्टी सीएम का कांग्रेस कनेक्शन 
​उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस और फिर बसपा से की थी। 2017 के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में आए पाठक ने अपनी कार्यशैली से पार्टी में जगह बनाई और आज वे यूपी के सबसे प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरों में से एक हैं।

​बासवराज बोम्मई: जनता दल (S) से कर्नाटक की कुर्सी 
​कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई का परिवार जनता दल की राजनीति से जुड़ा था। 2008 में वे बीजेपी में शामिल हुए और बीएस येदियुरप्पा के हटने के बाद 2021 में बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।