Direct Seeded Rice (DSR): धान की सीधी बुवाई से पानी की खपत 35% कम और लागत में ₹14,000 तक की बचत संभव है। FSII के अध्यक्ष अजय राणा ने गिरते भूजल स्तर को बचाने के लिए इस तकनीक को जरूरी बताया है।

DSR paddy benefits: भारत में धान की पारंपरिक खेती पर भूजल के अत्यधिक दोहन का गंभीर दबाव है। फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि पंजाब में भूजल दोहन 156% और हरियाणा में 137% तक पहुंच चुका है। चूंकि एक किलो चावल उगाने में 3,000 से 5,000 लीटर पानी खर्च होता है, इसलिए अब धान की सीधी बुवाई (DSR) जैसे जल-कुशल विकल्पों की ओर बढ़ना अनिवार्य हो गया है।

लागत में कमी और पानी की 35% बचत
DSR तकनीक को अपनाने से न केवल पानी की खपत में 35% तक की कमी आती है, बल्कि खेती की लागत में भी प्रति हेक्टेयर ₹14,000 तक की बचत संभव है। पारंपरिक रोपाई की तुलना में इसमें श्रम (लेबर) की कम आवश्यकता होती है और नर्सरी तैयार करने का खर्च भी बचता है। यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सक्षम है।

नवाचार से दूर हुई खरपतवार की समस्या
धान की सीधी बुवाई में खरपतवार (Weeds) प्रबंधन हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। अजय राणा के अनुसार, बीज उद्योग ने सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर 'हर्बिसाइड-सहिष्णु' (Herbicide Tolerant) तकनीक विकसित की है। पिछले खरीफ मौसम में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में इस उन्नत तकनीक से सफलतापूर्वक खेती की गई है।

भविष्य का रोडमैप और तकनीकी सहायता
नई दिल्ली में आयोजित FSII के दूसरे सम्मेलन में नीति-निर्माताओं और वैज्ञानिकों ने DSR को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप पर चर्चा की। बीज उद्योग अब अंकुरण के दौरान होने वाले नेमाटोड संक्रमण जैसी नई चुनौतियों से निपटने के लिए भी आधुनिक रिसर्च कर रहा है। इसका उद्देश्य भारत के धान उत्पादक क्षेत्रों को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाना है।