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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति संकट के बीच भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संभावित बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चिंता बन सकती है।

मुंबई। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच गुरुवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और ऊर्जा आपूर्ति में संभावित बाधाओं के कारण निवेशकों की चिंता बढ़ी है, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर देखने को मिला। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया कमजोर होकर एक डॉलर के मुकाबले लगभग 92.52 रुपए तक पहुंच गया, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर है। 

भू-राजनीतिक तनाव ने बढ़ाई समस्या
मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार तेल की कीमतों में तेजी और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण निवेशकों का भरोसा कुछ कमजोर पड़ा है। इस स्थिति के पीछे प्रमुख कारण क्षेत्र में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान से जुड़े घटनाक्रमों और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज में संभावित रुकावट की आशंका ने वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के कुल तेल परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। यदि इस रास्ते से तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो इसका प्रभाव कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। भारत का 50% तेल आयात इसी मार्ग से होता है।  

आयात से पूरी होती हैं अधिकांश ऊर्जा जरूरतें
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अनुमान के मुताबिक देश में उपयोग होने वाले कुल तेल और गैस का करीब 80 प्रतिशत आयात के जरिए आता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है और ईरान तथा सऊदी अरब जैसे मध्य पूर्वी देशों से आयात बढ़ाया है। हालांकि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है, जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और मुद्रा बाजार पर भी पड़ता है।

वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है असर
कच्चे तेल और गैस की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रही तो इसका असर भारत की वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है। ऊर्जा की लागत बढ़ने से सरकार पर उर्वरक और रसोई गैस जैसी योजनाओं में अधिक सब्सिडी देने का दबाव बढ़ सकता है। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। दूसरी ओर, ऊर्जा महंगी होने से घरेलू खर्च और बचत पर भी प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उपभोग में कमी आ सकती है और आर्थिक विकास की रफ्तार पर असर पड़ सकता है।

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