Israel-Iran Conflict: ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध से पूरा मध्य एशिया हिला हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं हैं। लेकिन, भारत के पास अभी भी 250 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल भंडार है, जो करीब 7-8 हफ्तों की जरूरत पूरी कर सकता। भारत अब 40 देशों से तेल खरीद रहा है और रूस फरवरी 2026 तक सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है।

Israel-Iran Conflict: भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सामने आई एक सरकारी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के पास इस समय 250 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का संयुक्त भंडार मौजूद है। इसे अगर लीटर में समझें तो यह करीब 4000 करोड़ लीटर तेल के बराबर है, जो पूरे सप्लाई सिस्टम के लिए लगभग 7 से 8 हफ्तों की जरूरत को पूरा करने में सक्षम है।

रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि भारत के पास सिर्फ 25 दिनों का तेल भंडार होने का दावा सही नहीं है। असल में देश का यह स्टॉक कई जगहों पर फैला हुआ है। इसमें मैंगलोर, पाडुर और विशाखापत्तनम में बने भूमिगत रणनीतिक भंडार शामिल हैं। इसके अलावा जमीन के ऊपर बने बड़े टैंकों, पाइपलाइन नेटवर्क और समुद्र में खड़े तेल जहाजों में भी काफी मात्रा में तेल स्टोर किया जाता है।

भारत अब 40 देशों से तेल खरीद रहा
रिपोर्ट के अनुसार भारत की ऊर्जा खरीद नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर बनाई गई है। पिछले दस सालों में भारत ने अपने तेल आपूर्तिकर्ताओं की संख्या भी बढ़ाई है। पहले जहां देश 27 देशों से तेल खरीदता था, अब यह संख्या बढ़कर 40 देशों तक पहुंच गई है। इससे किसी एक देश या रास्ते पर निर्भरता काफी कम हो गई।

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से भारत पर ज्यादा असर नहीं
वैश्विक स्तर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तेल सप्लाई का बड़ा रास्ता माना जाता है, लेकिन भारत के लिए यह अब एकमात्र विकल्प नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा ही इस रास्ते से आता है, जबकि बाकी 60 प्रतिशत सप्लाई रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया जैसे इलाकों से अलग-अलग मार्गों से होती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वह समय खत्म हो चुका है जब भारत की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ एक समुद्री रास्ते पर निर्भर करती थी। अगर किसी एक मार्ग में रुकावट आती भी है तो भारत उसे सप्लाई इमरजेंसी नहीं बल्कि मैनेज्ड एडजस्टमेंट के रूप में संभाल सकता है।

भारत रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीद रहा
तेल आपूर्ति के मामले में रूस फरवरी 2026 तक भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने कभी किसी देश की अनुमति पर निर्भर होकर रूसी तेल नहीं खरीदा। भारत फरवरी 2026 में भी रूस से तेल आयात कर रहा है और साथ ही G-7 के प्राइस कैप नियमों का पालन भी कर रहा है। हाल ही में अमेरिका की ओर से 30 दिन की छूट मिलने के बाद इस प्रक्रिया में और आसानी आई है।

भारत की रिफाइनिंग क्षमता पहले के मुकाबले बढ़ी
देश के अंदर भी तेल पर निर्भरता कम करने के प्रयास जारी हैं। 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के कारण हर साल करीब 44 मिलियन बैरल कच्चे तेल की बचत हो रही है। वहीं भारत की रिफाइनिंग क्षमता अब 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक पहुंच चुकी है, जो देश की 210–230 मिलियन मीट्रिक टन की खपत से ज्यादा है।

इस मजबूत रिफाइनिंग क्षमता की वजह से भारतीय रिफाइनर यूरोप में भी ईंधन की कमी को पूरा करने में सक्षम रहे, खासकर तब जब रूस पर प्रतिबंधों के बाद वहां सप्लाई प्रभावित हुई।

रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पिछले चार साल से काफी स्थिर बनी हुई हैं। फरवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 0.67 प्रतिशत कम हुई, जबकि इसी अवधि में पाकिस्तान में कीमतें 55 प्रतिशत और जर्मनी में 22 प्रतिशत तक बढ़ गईं।

हालांकि कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को भारी नुकसान भी उठाना पड़ा। कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल पर करीब 24,500 करोड़ रुपये और एलपीजी पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का घाटा सहा।

रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है कि भारत की ऊर्जा नीति तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित है। पहला सस्ती कीमत, लगातार उपलब्धता और टिकाऊ व्यवस्था। यही वजह है कि पिछले 12 वर्षों में देश में किसी भी पेट्रोल पंप पर ईंधन की कमी की स्थिति नहीं बनी।

(प्रियंका कुमारी)