मुंबई। पश्चिम एशिया में युद्धविराम (सीजफायर) लागू होने के बाद भी भारतीय केमिकल निर्यातकों को राहत नहीं मिल पाई है। हालांकि संघर्ष फिलहाल थमा है, लेकिन सप्लाई चेन अब भी प्रभावित बनी हुई है। गल्फ कॉरिडोर के जरिए होने वाली शिपिंग में अनिश्चितता बनी हुई है। इसका सीधा असर आयात-निर्यात दोनों पर पड़ रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि लागत बढ़ने और लॉजिस्टिक समस्याओं ने हालात जटिल बना दिए हैं। स्थिति सामान्य होने में अभी समय लग सकता है।
हॉर्मुज से जुड़ी सप्लाई चेन में दिक्कतें
केमिकल यूनिट संचालकों के मुताबिक हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े ऑपरेशन अब भी दबाव में हैं। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम रास्ता माना जाता है। यहां बाधा आने से कच्चे माल की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो रही हैं। निर्यातकों के लिए उत्पादन योजना बनाना भी मुश्किल हो गया है। ऑर्डर समय पर पूरे करना चुनौती बनता जा रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर दिख रहा है।
अब भी जोखिम में है 40–50% व्यापार
केमेक्सिल के चेयरमैन सतीश वाघ के अनुसार स्थिति अभी भी गंभीर है। उन्होंने कहा कि भारत के लगभग 40 से 50 प्रतिशत आयात, निर्यात और ट्रांसशिपमेंट जोखिम में हैं। खासतौर पर वे कारोबार जो खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उन्होंने बताया कि संगठन के 60% से अधिक सदस्य MSME सेक्टर से जुड़े हैं। ये कंपनियां ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं। इस कारण संकट का असर छोटे उद्योगों पर ज्यादा पड़ रहा है।
कच्चे माल और ऊर्जा लागत में भारी उछाल
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे माल की कीमतों में तेजी आई है। नाफ्था, एलपीजी, एथेन जैसे फीडस्टॉक और एथिलीन, प्रोपिलीन जैसे इंटरमीडिएट महंगे हो गए हैं। इसके अलावा पोटाश आधारित कच्चे माल की कीमतों में भी तेज वृद्धि देखी गई है। हीलियम, यूरिया, सल्फर और कॉस्टिक सोडा जैसे उत्पादों की सप्लाई प्रभावित हुई है। ऊर्जा की कमी के कारण उद्योगों को वैकल्पिक ईंधन अपनाना पड़ रहा है। इससे उत्पादन लागत और बढ़ गई है।
शिपिंग महंगी, डिलीवरी में देरी बढ़ी
सीजफायर के बावजूद शिपिंग सेवाएं अभी सामान्य नहीं हुई हैं। बीमा कंपनियां अभी भी इस क्षेत्र को हाई-रिस्क जोन मान रही हैं। इस कारण वॉर-रिस्क प्रीमियम अधिक बना हुआ है। जहाजों को सुरक्षित मार्गों से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं। शिपिंग कंपनियों ने अतिरिक्त शुल्क भी लागू कर दिया है। इससे प्रोजेक्ट डिलीवरी में 25–30 दिन तक की देरी हो रही है।
MSME की लागत और जोखिम बढ़ा
महंगे ईंधन और ट्रांसपोर्ट लागत ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। डीजल की कीमत कई क्षेत्रों में 104 रुपए प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गई है। इससे इनलैंड फ्रेट और लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ गया है। उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव से इन्वेंट्री लागत भी बढ़ रही है। MSME कंपनियों को ज्यादा वर्किंग कैपिटल की जरूरत पड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक कीमत गिरने पर नुकसान का जोखिम भी बढ़ गया है।