नई दिल्ली। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने एयरसेल ग्रुप के कर्जदाताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दाखिल की है। यह याचिका 13 फरवरी के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि टेलीकॉम स्पेक्ट्रम को दिवाला प्रक्रिया में एसेट नहीं माना जा सकता। इस फैसले का सीधा असर एयरसेल और रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) जैसे मामलों पर पड़ा है। दोनों कंपनियां पहले से ही दिवाला प्रक्रिया (सीआईआरपी) में हैं लेकिन समाधान प्रक्रिया अटकी हुई है। एसबीआई का कहना है कि यह फैसला बैंकिंग सेक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। बैंक ने समीक्षा याचिका में कहा है कि फैसले में कई स्पष्ट कानूनी त्रुटियां हैं।
क्या हैं एसबीआई के मुख्य तर्क
एसबीआई ने कोर्ट से कहा कि यह निर्णय रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटियों से ग्रस्त है। बैंक का आरोप है कि कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर विचार नहीं किया। इनमें स्पेक्ट्रम उपयोग अधिकार का स्वरूप भी शामिल है। साथ ही सरकार के बकाया को आईबीसी के तहत कैसे वर्गीकृत किया जाए, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया। एसबीआई का मानना है कि इन मुद्दों का सीधा असर कर्जदाताओं के अधिकारों पर पड़ता है। अगर स्पेक्ट्रम को एसेट नहीं माना जाएगा तो बैंकों की रिकवरी प्रभावित होगी। इससे भविष्य में लोन देने का जोखिम भी बढ़ सकता है।
एयरसेल और आरकॉम पर प्रभाव
एयरसेल को 2018 में और आरकॉम को 2019 में दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया गया था। लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण इनका समाधान अब तक नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्थिति और जटिल हो गई है। आरकॉम के रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने भी इस फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की है। इसका मतलब है कि पूरा टेलीकॉम सेक्टर इस फैसले से प्रभावित हो रहा है। कर्जदाताओं के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है। बैंकिंग सेक्टर में अनिश्चितता बढ़ गई है।
सरकार बनाम कर्जदाता-किसे फायदा?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सरकार के पक्ष में गया है। कोर्ट ने कहा कि स्पेक्ट्रम एक राष्ट्रीय संसाधन है और इसे सार्वजनिक हित में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। आईबीसी को स्पेक्ट्रम के स्वामित्व और नियंत्रण तय करने का आधार नहीं माना जा सकता। इसका अर्थ है कि कंपनियां दिवाला प्रक्रिया में स्पेक्ट्रम को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकतीं। इससे सरकार का नियंत्रण मजबूत होता है। लेकिन बैंकों के लिए रिकवरी के रास्ते सीमित हो जाते हैं। यही कारण है कि एसबीआई इस फैसले की समीक्षा चाहती है।