बांग्लादेश चुनाव: 17 करोड़ की आबादी, लेकिन अल्पसंख्यक उम्मीदवार मात्र 80; इस पार्टी ने दिए सबसे ज्यादा टिकट

अवामी लीग के बाहर होने से पैदा हुई कमी के बीच BNP ने सबसे ज्यादा टिकट दिए हैं। वहीं, BMJP जैसी नई पार्टियाँ अल्पसंख्यकों की आवाज बनने का प्रयास कर रही हैं।

Updated On 2026-01-24 09:35:00 IST

कुल 300 संसदीय सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में केवल 80 अल्पसंख्यक चेहरे मैदान में हैं।

नई दिल्ली : बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। लेकिन इस बीच एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है।

करीब 17.5 करोड़ की आबादी वाले इस मुल्क में, जहा अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं) की आबादी लगभग 8-9% है, चुनावी मैदान में अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की संख्या सिमट कर मात्र 80 रह गई है।

शेख हसीना की अवामी लीग के सत्ता से हटने और पार्टी पर प्रतिबंध लगने के बाद, मुख्यधारा की राजनीति में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है।

​अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व में भारी गिरावट

​आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, इस बार के चुनाव में अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की संख्या में भारी कमी आई है। कुल 300 संसदीय सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में केवल 80 अल्पसंख्यक चेहरे मैदान में हैं।

जानकारों का मानना है कि अवामी लीग, जो पारंपरिक रूप से अल्पसंख्यकों की पहली पसंद रही है और उन्हें अधिक टिकट देती थी, उसके चुनाव से बाहर होने के कारण यह शून्यता पैदा हुई है।

इसके चलते हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों में अपनी राजनीतिक आवाज को लेकर गहरी चिंता देखी जा रही है।

​इस पार्टी ने दिए सबसे ज्यादा टिकट

​मौजूदा चुनावी समीकरणों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में सबसे आगे नजर आ रही है।

तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी ने अपनी छवि सुधारने और अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतने के लिए इस बार अधिक संख्या में गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका दिया है।

हालांकि, इसकी तुलना में कट्टरपंथी झुकाव वाली पार्टियों और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के प्रभाव के कारण अल्पसंख्यकों के लिए चुनावी राह अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

​हिंदू संगठनों और नई पार्टियों की भूमिका

​प्रतिनिधित्व की इस कमी को पूरा करने के लिए इस बार बांग्लादेश माइनॉरिटी जनता पार्टी (BMJP) जैसी नई पार्टियाँ भी मैदान में उतरी हैं। बीएमजेपी ने दावा किया है कि वह लगभग 91 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है ताकि संसद में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की आवाज बुलंद की जा सके।

इसके अलावा, छात्रों के आंदोलन से निकली नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) भी खुद को एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है, लेकिन उम्मीदवारों की सूची में अल्पसंख्यकों का ग्राफ अभी भी काफी नीचे है।

​अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और हिंसा का साया

​खबर के अनुसार, 2024 के तख्तापलट के बाद से बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 600 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं।

मानवाधिकार संगठनों (HRW) ने भी चेतावनी दी है कि चुनाव से पहले धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। इस असुरक्षित माहौल के कारण भी कई अल्पसंख्यक नेता चुनाव लड़ने से कतरा रहे हैं।

चुनाव आयोग और अंतरिम सरकार के दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर चुनावी निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

​राजनीतिक विश्लेषकों की राय

​विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश की राजनीति में रहा यह बदलाव देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है।

यदि संसद में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व इसी तरह कम होता रहा, तो भविष्य में उनके अधिकारों से जुड़े कानूनों और सुरक्षा नीतियों पर गहरा असर पड़ सकता है।

फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें 12 फरवरी को होने वाली वोटिंग पर टिकी हैं कि क्या बांग्लादेश एक समावेशी लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा या कट्टरपंथ की गिरफ्त में जाएगा।

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