बजट सत्र: लोकसभा में PM नहीं बोले, संसद गूंजती रही | क्या यह लोकतंत्र का पतन है? | Debate Video
लोकसभा में PM नहीं बोले, राज्यसभा में रखा पक्ष। बजट सत्र के हंगामे ने उठाया सवाल- क्या अमृत काल में संसद का संवाद खत्म हो रहा है? देखिए वीडियो
भारत के लोकतंत्र के 75 वर्षों में संसद हमेशा संवाद और तर्क का सबसे बड़ा मंच रही है। लेकिन बजट सत्र के दौरान बीते चार दिनों से लोकसभा और राज्यसभा में जारी गतिरोध ने इस परंपरा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन नहीं हो सका और बिना विस्तृत चर्चा के राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। वहीं दूसरी ओर, प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान विपक्ष पर तीखे प्रहार किए और संसद के व्यवधान पर अपनी बात रखी।
सदनों में लगातार शोर, आरोप-प्रत्यारोप और भाषा की गिरती मर्यादा के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है- क्या यह केवल राजनीतिक टकराव है या फिर ‘अमृत काल’ में भारतीय लोकतंत्र के संवाद तंत्र का पतन?
इसी मुद्दे पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने राजनीति, पत्रकारिता और प्रशासन से जुड़े दिग्गजों के साथ "चर्चा" की। सभी प्रवक्ताओं ने संसद की स्थिति, भाषा की मर्यादा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन पर खुलकर अपनी बात रखी।
इस खास पेशकश में शामिल हुए-
- डॉ. चिंतामणि मालवीय, विधायक एवं पूर्व सांसद भाजपा
- प्रेम कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
- भगवान देव ईसरानी, पूर्व प्रमुख सचिव विधानसभा मध्य प्रदेश
- प्रतापभानु शर्मा, पूर्व सांसद कांग्रेस
क्या संसद में भाषा और मर्यादा का पतन हो रहा है?
क्या संवाद की जगह टकराव ने ले ली है?
पूरी बहस देखें और खुद तय करें- देश किस दिशा में जा रहा है।
यहां देखिए वीडियो