दहेज प्रताड़ना में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: डिविजन बेंच ने परिजनों के खिलाफ दर्ज FIR और आपराधिक कार्रवाई को किया रद्द
हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मोहम्मद शाहरुख खान और उनके परिजनों के खिलाफ दर्ज FIR और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट
पंकज गुप्ते- बिलासपुर। हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मोहम्मद शाहरुख खान और उनके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। डिविजन बेंच ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि आपराधिक कानून को उत्पीड़न का साधन नहीं बनने दिया जा सकता। दरअसल पूरा मामला बिलासपुर निवासी मोहम्मद शाहरुख खान से जुड़ा है, जिनका विवाह 18 जनवरी 2022 को मुस्लिम रीति-रिवाज से सदर रोड, अंबिकापुर निवासी युवती से संपन्न हुआ था।
पति-पत्नी के बीच आपसी तालमेल न बैठने के कारण 18 दिसंबर 2023 को शाहरुख अपनी पत्नी को अंबिकापुर उसके मायके छोड़ आए थे। इसके करीब तीन माह बाद 19 मार्च 2024 को पत्नी ने महिला थाना अंबिकापुर और जिला कलेक्टर बिलासपुर के समक्ष दहेज प्रताड़ना और स्त्रीधन रखे जाने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। वहीं, पत्नी को मायके छोड़ने के बाद शाहरुख के ताऊ द्वारा पुलिस को दिए गए लिखित बयान में यह स्वीकार किया गया था कि सोने-चांदी के जेवरात पत्नी को सौंपकर उसके परिवार को देने के लिए कहा गया था।
BNS के तहत दर्ज किया गया केस
इस प्रकरण में मोहम्मद शाहरुख खान ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसकी पैरवी अधिवक्ता टी.सी. अब्राहम ने की और आरोप पत्र सहित आपराधिक प्रकरण क्रमांक 1368/2024 को निरस्त करने का आग्रह किया गया। सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से 25 लाख रुपये की एकमुश्त भरण-पोषण राशि की मांग का उल्लेख भी आया, जिसे न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिविजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में बिना ठोस और विशिष्ट आरोपों के पति के पूरे परिवार को आपराधिक मामलों में घसीटना उचित नहीं है।
फैमिली कोर्ट ने दावा किया खारिज
अदालत ने यह भी कहा कि महिला थाना अंबिकापुर में दर्ज अपराध क्रमांक 10/2024 में लगाए गए आरोप सामान्य, अस्पष्ट और ठोस तथ्यों से रहित हैं, जिनसे धारा 498-ए आईपीसी और दहेज निषेध अधिनियम के तहत कोई स्पष्ट अपराध बनता नहीं दिखता। इधर, भरण-पोषण के मामले में भी पत्नी को राहत नहीं मिली। पत्नी द्वारा फैमिली कोर्ट अंबिकापुर में पति से 50 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण की मांग की गई थी लेकिन पत्नी के स्कूल में संविदा शिक्षिका होने के आधार पर फैमिली कोर्ट ने यह दावा खारिज कर दिया।