ईरान में महाक्रांति: 21 प्रांतों में सुलगी बगावत की चिंगारी,'Death to Dictator' के नारों से गूंजा तेहरान!

21 प्रांतों में सुलगी बगावत की चिंगारी,Death to Dictator  के नारों से गूंजा तेहरान!
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सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई प्रांतों में छुट्टी घोषित कर दी है और इंटरनेट पर पाबंदियां लगा दी हैं।

ईरान के 21 प्रांतों में आर्थिक बदहाली और महंगाई के खिलाफ भीषण जन-विद्रोह शुरू हो गया है। तेहरान के बाजारों से उठी यह चिंगारी अब शासन परिवर्तन की मांग में बदल चुकी है।

नई दिल्ली : ईरान में साल 2026 की शुरुआत भीषण जन-आक्रोश के साथ हुई है। देश की गिरती अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची महंगाई और सख्त सरकारी पाबंदियों ने आम जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

तेहरान के बाजारों से शुरू हुआ यह विरोध अब देश के 21 प्रांतों तक फैल चुका है। प्रदर्शनकारी न केवल आर्थिक सुधारों की मांग कर रहे हैं, बल्कि अब सीधे तौर पर 'डेथ टू डिक्टेटर' और शासन परिवर्तन के नारे लगा रहे हैं।

सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई प्रांतों में छुट्टी घोषित कर दी है और इंटरनेट पर पाबंदियां लगा दी हैं, लेकिन जनता का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है।

बाजार से शुरू होकर सड़कों तक पहुंची विद्रोह की आग

ईरान की इस नई बगावत की शुरुआत तेहरान के ग्रैंड बाजार से हुई, जहां दुकानदारों ने ईरानी रियाल की भारी गिरावट और आसमान छूती कीमतों के विरोध में अपनी दुकानें बंद कर दीं।

रियाल का मूल्य डॉलर के मुकाबले अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आयातित वस्तुओं की कीमतें दोगुनी हो गई हैं। व्यापारियों का यह गुस्सा जल्द ही आम नागरिकों और छात्रों के बीच फैल गया।

तेहरान, इस्फ़हान, शिराज और मशहद जैसे प्रमुख शहरों में रैलियां निकाली जा रही हैं, जो अब पूरी तरह से सरकार विरोधी आंदोलन में तब्दील हो चुकी हैं।

'डेथ टू डिक्टेटर' के नारों से गूंजी ईरान की गलियां

प्रदर्शनों के दौरान सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात नारों की तीव्रता है। प्रदर्शनकारी सीधे तौर पर सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को निशाना बना रहे हैं। सड़कों पर "तानाशाह मुर्दाबाद" और "हमे गजा या लेबनान नहीं, अपना देश चाहिए" जैसे नारे गूंज रहे हैं।

लोगों का आरोप है कि सरकार देश के पैसे को क्षेत्रीय संघर्षों और विदेशी समूहों की मदद में बर्बाद कर रही है, जबकि देश की जनता दाने-दाने को मोहताज है। यह आक्रोश साल 2022 के हिजाब विरोधी प्रदर्शनों से भी बड़ा रूप लेता दिखाई दे रहा है।

21 प्रांतों में कर्फ्यू जैसा माहौल और सरकारी दमन

खबरों के अनुसार, बगावत की आंच अब ईरान के 31 में से 21 प्रांतों तक पहुंच गई है। सरकार ने प्रदर्शनों को रोकने के लिए तेहरान सहित कई इलाकों में अचानक सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी है ताकि लोग इकट्ठा न हो सकें।

नाहवंद, हमादान और असदाबाद जैसे शहरों में सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और बल प्रयोग की खबरें भी आ रही हैं। प्रशासन इसे विदेशी साजिश करार दे रहा है, लेकिन सड़कों पर उतरी भीड़ इस बार किसी भी समझौते के मूड में नहीं दिख रही है।

विश्वविद्यालय बने विरोध के नए केंद्र

सिर्फ व्यापारी ही नहीं, बल्कि ईरान की युवा पीढ़ी और छात्र भी इस आंदोलन के मोर्चे पर हैं। तेहरान के छह प्रमुख विश्वविद्यालयों और इस्फ़हान के शिक्षण संस्थानों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया।

"डरो मत, हम सब साथ हैं" के नारों के साथ छात्र सड़कों पर उतरे, जिसके बाद सुरक्षा बलों और छात्रों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं।

कई विश्वविद्यालयों को प्रशासन ने एहतियातन बंद कर दिया है और कक्षाओं को ऑनलाइन शिफ्ट कर दिया गया है, ताकि छात्रों की एकजुटता को तोड़ा जा सके।

राष्ट्रपति की अपील और शासन के सामने बड़ी चुनौती

बढ़ते दबाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने प्रदर्शनकारियों की 'वाजिब मांगों' को सुनने और बातचीत करने का वादा किया है। उन्होंने अधिकारियों को व्यापारियों और जनता के प्रतिनिधियों से संवाद करने का निर्देश दिया है।

हालांकि, प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ये केवल समय काटने के तरीके हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी ईरान के हालातों पर नजर रखे हुए है, क्योंकि आर्थिक तंगी और नागरिक असंतोष के इस मेल ने ईरानी शासन के सामने दशकों की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

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