गाजा बोर्ड ऑफ पीस: ट्रंप की योजना में पाकिस्तान की एंट्री, देश में सियासी घमासान; विपक्ष ने की कड़ी आलोचना

यह विवाद पाकिस्तान की मध्य पूर्व नीति और बहुपक्षीय कूटनीति पर एक गहरी बहस को जन्म दे रहा है।
पाकिस्तान सरकार के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के फैसले ने देश में तीखा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। यह बोर्ड गाजा में स्थायी शांति, पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता के लिए गठित किया गया है, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के ढांचे के तहत काम करेगा।
विदेश मंत्रालय ने फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि पाकिस्तान गाजा शांति योजना के कार्यान्वयन में सहयोग देगा। सरकार के अनुसार, इससे स्थायी युद्धविराम सुनिश्चित होगा, फिलिस्तीनियों को अधिक मानवीय सहायता मिलेगी और गाजा के पुनर्निर्माण में ठोस प्रगति संभव हो सकेगी।
विपक्ष की कड़ी आपत्ति
इस कदम को लेकर पाकिस्तान में घरेलू स्तर पर कड़ी आलोचना हो रही है। सीनेट में विपक्षी नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने इसे नैतिक रूप से गलत और नीतिगत रूप से अस्वीकार्य करार दिया।
उन्होंने कहा कि यह पहल शुरू से ही विवादास्पद रही है और गाजा युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के नाम पर बनाई गई यह व्यवस्था फिलिस्तीनी जनता से उनका शासन अधिकार छीनने की कोशिश है।
I denounce the government’s decision to join US President Donald Trump’s Board of Peace as it is morally incorrect and indefensible, both on principle and on policy.
— Senator Allama Raja Nasir (@AllamaRajaNasir) January 21, 2026
The initiative was problematic from the outset. Conceived as an externally managed arrangement for post-war Gaza,…
नव-औपनिवेशिक सोच का आरोप
राजा नासिर अब्बास ने कहा कि पुनर्निर्माण, सुरक्षा और राजनीतिक निगरानी को बाहरी शक्तियों के हवाले करना नव-औपनिवेशिक सोच को दर्शाता है। इससे फिलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल
अब्बास ने चिंता जताई कि पहले गाजा में सीमित पुनर्निर्माण के रूप में पेश की गई इस योजना का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। उनका कहना है कि बोर्ड का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करना या उसे दरकिनार करना प्रतीत होता है। पाकिस्तान की भागीदारी इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि वह कश्मीर जैसे मुद्दों पर हमेशा यूएन प्रस्तावों और बहुपक्षीय मंचों पर जोर देता आया है।
संसद को नजरअंदाज करने का आरोप
संविधान संरक्षण आंदोलन के उपाध्यक्ष मुस्तफा नवाज खोखर ने भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि संसद की राय या सार्वजनिक बहस के बिना इस बोर्ड में शामिल होना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और यह जनता के प्रति उपेक्षा दर्शाता है।
‘अमीरों का क्लब’ बनने का दावा
खोखर ने आरोप लगाया कि तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ गाजा पर शासन थोपने और संयुक्त राष्ट्र के समानांतर संरचना बनाने की औपनिवेशिक कोशिश है।
उन्होंने कहा कि बोर्ड का चार्टर ट्रंप को एकतरफा और निरंकुश अधिकार देता है। एक अरब डॉलर देकर स्थायी सदस्यता का प्रावधान इसे ‘अमीरों का क्लब’ बनाता है, जो समानता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
पूर्व राजदूत की चेतावनी
पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने भी इस फैसले को अविवेकपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि सरकार यह नजरअंदाज कर रही है कि ट्रंप इस बोर्ड के जरिए अपने एकतरफा फैसलों को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाना चाहते हैं।
उनके अनुसार, बोर्ड का कार्यक्षेत्र गाजा से कहीं आगे तक फैला हुआ है, जो इसमें शामिल न होने का मजबूत कारण है।
सरकार बनाम विपक्ष की दो टूक
कुल मिलाकर, सरकार इस फैसले को शांति और पुनर्निर्माण की दिशा में सकारात्मक कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे फिलिस्तीनी अधिकारों, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और पाकिस्तान की स्वतंत्र विदेश नीति के खिलाफ मान रहा है। यह विवाद पाकिस्तान की मध्य पूर्व नीति और बहुपक्षीय कूटनीति पर एक गहरी बहस को जन्म दे रहा है।
