मिडिल-ईस्ट में युद्ध के बाद अब कूटनीति का दौर शुरू हुआ है। अमेरिका और ईरान दूसरे दौर की शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद में जुटने वाले हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच बेहद तनावपूर्ण रिश्तों के बीच एक बार फिर कूटनीति की उम्मीद जगी है। पहले दौर की 41 घंटे लंबी और नाकाम बातचीत के बाद, अब दोनों देश दूसरे दौर की वार्ता के लिए सहमत हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधि जल्द ही आमने-सामने बैठ सकते हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देश समझौते के "बेहद करीब" हैं और अगले कुछ दिनों में बड़ी प्रगति देखने को मिल सकती है। हालांकि, कड़वी हकीकत यह है कि अमेरिका द्वारा रखी गई 10 शर्तें इस डील की राह में पहाड़ बनकर खड़ी हैं।

​ट्रंप की 10 बड़ी शर्तें: क्या तेहरान करेगा सरेंडर? 
​अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने जो शर्तें रखी हैं, उनमें परमाणु कार्यक्रम से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक सब कुछ शामिल है। ये 10 शर्तें इस प्रकार हैं:- 

  1. ​ईरान के सभी परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की पूरी छूट देना।
  2. ​440 किलो एनरिच्ड यूरेनियम सौंपना और यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तुरंत बंद करना।
  3. ​सभी तरह की मिसाइलों के भंडार को सार्वजनिक करना।
  4. ​लंबी दूरी की मिसाइलों (ICBMs) के निर्माण और परीक्षण पर पूर्ण नियंत्रण।
  5. ​होर्मुज स्ट्रेट से अपना नियंत्रण हटाना और इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करना।
  6. ​हिज्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे प्रॉक्सी नेटवर्क को खत्म करना।
  7. ​इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और बासिज मिलिशिया को भंग करना।
  8. ​अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करना।
  9. ​'जनवरी नरसंहार' के दोषियों को सख्त सजा देना।
  10. ​क्षेत्रीय कूटनीति में अमेरिकी हितों को चुनौती न देना।

​ईरान का रुख: "दबाव स्वीकार नहीं, लेकिन शांति चाहते हैं" 
​ईरान की ओर से भी कूटनीतिक सक्रियता काफी बढ़ गई है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ कहा है कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता, लेकिन वह किसी भी तरह का बाहरी दबाव या 'सरेंडर' स्वीकार नहीं करेगा।

ईरान ने संकेत दिया है कि वह मध्य मार्ग के तौर पर कुछ वर्षों के लिए यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाने जैसे प्रस्तावों पर विचार कर सकता है। वहीं, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का प्रस्ताव भी चर्चा में है, जिसके तहत ईरान अपना एनरिच्ड यूरेनियम रूस को सौंप सकता है और रूस उसे प्रोसेस कर परमाणु ईंधन के रूप में वापस कर देगा।

​भरोसे की कमी और सीजफायर पर विचार 
​भले ही बातचीत की मेज सज रही हो, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई बहुत गहरी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी माना है कि दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास है, लेकिन बातचीत ही इसे कम करने का एकमात्र रास्ता है।

इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को दो हफ्ते और बढ़ाने पर भी विचार चल रहा है। ईरान की मांग है कि उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जाएं, फ्रीज की गई संपत्तियां बहाल हों और भविष्य में हमला न करने की लिखित गारंटी मिले।

​रणनीतिक महत्व: सिर्फ कूटनीति नहीं, सत्ता की जंग भी 
​विशेषज्ञों का मानना है कि यह बातचीत केवल कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। इससे न केवल ईरान की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि परमाणु हथियारों को लेकर दुनिया की चिंता भी कम होगी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेहरान अपनी संप्रभुता और रणनीतिक ताकत का बलिदान देकर ट्रंप की शर्तों को मानेगा? यह शांति वार्ता सफल होगी या नहीं, यह पूरी तरह से इन 10 शर्तों पर ईरान के जवाब पर निर्भर करेगा।