Saudi-Russia Relations: दशकों तक अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे सऊदी अरब और वॉशिंगटन के बीच अब दरार साफ दिखाई देने लगी है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया 'टैरिफ नीतियों' और खाड़ी युद्ध को लेकर उनके सख्त रुख ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को अपनी विदेश नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से ही दोनों देशों के बीच संबंधों में वह पुरानी गर्मजोशी नहीं दिखी, जिसका फायदा अब रूस उठा रहा है। सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता, यही वजह है कि क्राउन प्रिंस ने अब मॉस्को की ओर अपने कदम बढ़ाए हैं।
पुतिन और मोहम्मद बिन सलमान की दोस्ती के मायने
सऊदी क्राउन प्रिंस और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बढ़ती नजदीकियां वैश्विक राजनीति में एक नया ध्रुव तैयार कर रही हैं। दोनों नेताओं की फोन पर बातचीत में न केवल तेल उत्पादन (OPEC+) को लेकर सहमति जताई, बल्कि रक्षा और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।
रूस के लिए सऊदी अरब जैसा अमीर पार्टनर मिलना एक बड़ी कूटनीतिक जीत है, खासकर तब जब वह पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। वहीं, सऊदी अरब के लिए रूस एक ऐसा सहयोगी साबित हो रहा है जो बिना किसी 'मानवाधिकार' या 'लोकतंत्र' की शर्त के आधुनिक हथियार और तकनीक देने को तैयार है।
तेल और हथियार सौदों ने वॉशिंगटन की उड़ाई नींद
सऊदी अरब और रूस के बीच होने वाले संभावित सैन्य समझौतों ने पेंटागन और व्हाइट हाउस में खलबली मचा दी है। खबर है कि सऊदी अरब अब अमेरिका के 'पैट्रियट' मिसाइल सिस्टम के विकल्प के तौर पर रूस के S-400 या उससे भी उन्नत रक्षा प्रणालियों में दिलचस्पी दिखा रहा है।
इसके अलावा, वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सऊदी और रूस का एक सुर में बोलना अमेरिका की 'एनर्जी पॉलिसी' को सीधा चैलेंज दे रहा है। ट्रंप प्रशासन के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कैसे अपने इस पुराने साथी को वापस अपने पाले में लाए, क्योंकि सऊदी का रूस के करीब जाना सीधे तौर पर मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव को कम करना है।
क्या मिडिल ईस्ट में खत्म हो जाएगा अमेरिकी प्रभुत्व?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोहम्मद बिन सलमान का यह कदम 'मल्टी-पोलर वर्ल्ड' की ओर इशारा करता है। सऊदी अरब अब अपनी शर्तों पर व्यापार करना चाहता है। ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होने की इच्छा और अब रूस के साथ बढ़ते रक्षा संबंध यह दर्शाते हैं कि सऊदी अब किसी एक महाशक्ति के दबाव में काम नहीं करेगा।
यदि सऊदी अरब पूरी तरह से रूस और चीन के खेमे में चला जाता है, तो यह डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति की सबसे बड़ी विफलता मानी जाएगी।
फिलहाल, रियाद और मॉस्को की यह नई केमिस्ट्री आने वाले समय में वैश्विक बाजार और युद्ध की स्थितियों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखती है।