नई दिल्ली: हिंद महासागर में अमेरिकी टॉरपीड़ो हमले का शिकार हुए ईरानी युद्धपोत 'IRIS देना' को लेकर भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। 'रायसीना डायलॉग 2026' के मंच से उन्होंने साफ किया कि भारत संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पूरी तरह समर्थन करता है। हालांकि, उन्होंने मानवीय आधार पर क्षतिग्रस्त ईरानी जहाज को कोच्चि में शरण देने के फैसले को सही ठहराया, लेकिन जहाज की नियति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे "गलत वक्त पर गलत जगह फंस गए"।
मानवीय आधार पर दी गई थी कोच्चि में पनाह
डॉ. जयशंकर ने घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया कि ईरान की ओर से संदेश मिला था कि उनका एक जहाज, जो उस वक्त भारतीय सीमाओं के सबसे निकट था, तकनीकी खराबी के कारण बंदरगाह में आने की इच्छा जता रहा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब जहाज भारत के लिए रवाना हुए थे और जब वे यहाँ पहुँचे, तब तक क्षेत्रीय स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। भारत ने स्थिति को केवल मानवता के नजरिए से देखा और उन्हें मरम्मत के लिए कोच्चि में डॉक करने की अनुमति दी।
श्रीलंका के पास अमेरिकी टॉरपीड़ो हमले में डूबा जहाज
ईरानी युद्धपोत 'IRIS देना' की सुरक्षित वापसी संभव नहीं हो सकी। 4 मार्च को श्रीलंका के दक्षिणी तट से लगभग 40 समुद्री मील दूर गाले के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी पनडुब्बी से दागे गए एक टॉरपीड़ो ने इस ईरानी फ्रिगेट को निशाना बनाया। इस भीषण हमले के कारण जहाज समुद्र में डूब गया। जयशंकर ने इसे 'बदकिस्मती' करार देते हुए कहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद जहाज को बचाया नहीं जा सका।
#WATCH | Raisina Dialogue 2026 | EAM Dr S Jaishankar says, "I too support UNCLOS and international law... We got a message from the Iranian side that one of the ships, which presumably was closest to our borders at that point of time, wanted to come into our port. They were… pic.twitter.com/CujBWJkXIL
— ANI (@ANI) March 7, 2026
80 से अधिक नौसैनिकों की मौत
इस हमले के परिणाम विनाशकारी रहे हैं। शुरुआती रिपोर्टों और श्रीलंकाई अधिकारियों के अनुसार, इस हादसे में 80 से 87 लोगों के मारे जाने की खबरें हैं। अब तक 87 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 32 सवारों को जीवित बचाकर चिकित्सा उपचार के लिए गाले ले जाया गया है। अभी भी दर्जनों लोग लापता बताए जा रहे हैं। अमेरिका ने भी आधिकारिक तौर पर इस हमले की पुष्टि कर दी है।
हिंद महासागर की जटिल भू-राजनीति
सोशल मीडिया पर जारी बहसों का जवाब देते हुए विदेश मंत्री ने हिंद महासागर की भू-राजनीतिक हकीकत को समझने की सलाह दी। उन्होंने याद दिलाया कि डिएगो गार्सिया पिछले पांच दशकों से और जिबूती में विदेशी ताकतों के ठिकाने पिछले दो दशकों से मौजूद हैं। इसी कड़ी में हंबनटोटा का विकास भी हुआ। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत क्षेत्र की इन जटिलताओं को समझते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा है।










