India-US Trade Deal: क्यों भारत बना अमेरिका का नया ट्रेड पार्टनर? जानिए समझौते के बड़े मायने

नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार की शतरंज पर भारत ने बड़ी चाल चल दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बने मजबूत तालमेल का नतीजा यह रहा कि अमेरिका के साथ हुई ताज़ा ट्रेड डील ने भारत पर संभावित भारी टैरिफ की आशंकाओं को खत्म कर दिया।
इस समझौते के बाद अमेरिकी बाजार में ‘Made in India’ उत्पादों के लिए रास्ते आसान हो गए हैं, जबकि चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक झटका लगा है।
'टैरिफ किंग' से 'ट्रेड पार्टनर' तक का सफर: ट्रंप का नया रुख
कभी भारतीय कर प्रणाली की आलोचना करने वाले ट्रंप अब भारत के सबसे बड़े आर्थिक हितैषी बनकर उभरे हैं।
यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि पीएम मोदी की उस कूटनीतिक जीत का नतीजा है जिसने अमेरिका को यह विश्वास दिलाया कि चीन का असली विकल्प केवल भारत ही है।
इस समझौते के तहत मिली भारी टैक्स छूट भारतीय व्यापार के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है।
ड्रैगन की आर्थिक घेराबंदी: चीन को पीछे छोड़ नंबर-1 बनने की राह
इस ट्रेड डील की सबसे गहरी चोट चीन पर पड़ी है। अमेरिका ने अपनी 'चीन प्लस वन' नीति को अमली जामा पहनाते हुए भारत को तरजीह दी है। अब अमेरिकी कंपनियां बीजिंग के बजाय दिल्ली की ओर रुख कर रही हैं।
18 प्रतिशत का टैरिफ लाभ मिलने से भारतीय कंपनियों को चीन के मुकाबले एक बड़ा 'प्राइस एडवांटेज' मिल गया है, जो वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में बड़ा कदम है।
निर्यात के क्षेत्र में 'क्रांति': टेक्सटाइल और फार्मा की लगेगी लॉटरी
भारतीय बाजारों और एक्सपोर्ट हाउसेस में इस डील के बाद जश्न का माहौल है। विशेष रूप से कपड़ा, इंजीनियरिंग और दवा उद्योग के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाजे अब पूरी तरह खुल गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस छूट के बाद भारतीय निर्यात की विकास दर 25% तक जा सकती है, जिससे देश के करोड़ों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
आर्थिक संप्रभुता और विपक्ष की चिंताएं
जहाँ एक ओर उद्योग जगत इस डील को ऐतिहासिक बता रहा है, वहीं विपक्षी खेमा संसद में इसकी शर्तों को लेकर सवाल उठा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि इस भारी छूट के बदले भारत ने क्या खोया है, इसकी पारदर्शिता होनी चाहिए।
हालांकि, वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता पूरी तरह 'विन-विन' स्थिति में है और भारत के घरेलू हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है।
आने वाले कल की तस्वीर: 'फ्रेंडशोरिंग' से मजबूत होते रिश्ते
यह डील महज आयात-निर्यात का आंकड़ा नहीं है, बल्कि दो महाशक्तियों के बीच बढ़ते भरोसे का प्रमाण है।
'फ्रेंडशोरिंग' के इस दौर में अमेरिका अब भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और भरोसेमंद पार्टनर मान रहा है।
ट्रंप प्रशासन का यह नरम रुख संकेत दे रहा है कि भविष्य में रक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी बड़े धमाके होने बाकी हैं।
