ट्रेड वॉर में 'चेकमेट': भारत और यूरोप के बीच ऐतिहासिक डील की तैयारी, क्या व्यापारिक जंग हार जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप?

भारत और यूरोप के बीच ऐतिहासिक डील की तैयारी, क्या व्यापारिक जंग हार जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप?
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' अब अपने अंतिम पड़ाव पर है।

इस डील के बाद अमेरिका व्यापारिक दौड़ में पिछड़ सकता है, जबकि भारत और यूरोप नए वैश्विक आर्थिक केंद्र बनेंगे।

नई दिल्ली: वैश्विक अर्थव्यवस्था के बिसात पर एक ऐसी चाल चली जा रही है, जो व्हाइट हाउस की नींद उड़ा सकती है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' अब अपने अंतिम पड़ाव पर है।

जहां एक ओर डोनाल्ड ट्रंप "अमेरिका फर्स्ट" का नारा बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियां भारत और यूरोप एक दूसरे के करीब आकर अमेरिका के लिए खतरे की घंटी बजा रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने दो टूक कहा है कि इस नई व्यापारिक धुरी के बनने से अमेरिका 'अल्टीमेट लूजर' साबित होने वाला है।

​ट्रंप की 'दीवार' और भारत-यूरोप का 'सेतु'

​राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ और संरक्षणवादी नीतियों ने अमेरिका को व्यापारिक दुनिया में अलग-थलग करना शुरू कर दिया है।

जहां ट्रंप प्रशासन अन्य देशों पर भारी टैक्स लगाकर अमेरिकी बाजार को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं भारत और यूरोपीय संघ ने मिलकर इस 'दीवार' के समांतर एक नया 'सेतु' तैयार कर लिया है।

विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि भारत की विशाल श्रम शक्ति और यूरोपीय संघ की उच्च तकनीक के बीच होने वाला यह समझौता अमेरिकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धी दौड़ से बाहर कर देगा।

​डॉलर के प्रभुत्व को सीधी चुनौती

​यह समझौता केवल सामानों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल सप्लाई चेन के केंद्र को वाशिंगटन से खिसकाकर नई दिल्ली और ब्रुसेल्स की ओर ले जाने की एक सोची-झीली रणनीति है।

ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप की जिद ने उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों को मजबूर कर दिया है कि वे अमेरिका के बिना एक नया रास्ता खोजें। यदि यह डील फाइनल होती है, तो अमेरिकी उत्पादों को भारत और यूरोप के बाजारों में प्रवेश करने के लिए भारी शुल्क चुकाना होगा, जबकि भारतीय और यूरोपीय उत्पाद एक-दूसरे के यहा 'जीरो टैरिफ' पर उपलब्ध होंगे।

​विशेषज्ञों की चेतावनी: अमेरिका के पास समय कम

​प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका अपनी 'अति-राष्ट्रवादी' नीतियों के कारण उन उभरते हुए व्यापारिक गुटों से बाहर हो रहा है जो आने वाले दशक की दिशा तय करेंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन को यह समझने की जरूरत है कि वैश्विक व्यापार अब एक तरफा नहीं रह गया है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ती नजदीकियां इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि अब दुनिया को व्यापार करने के लिए 'अमेरिकी अनुमति' की आवश्यकता नहीं है।

​भारत के लिए गेम-चेंजर साबित होगी यह डील

​इस ऐतिहासिक समझौते से भारत के ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल और आईटी सेक्टर को पंख लगने की उम्मीद है। यूरोप जैसे उच्च-क्रय शक्ति वाले बाजार तक सीधी पहुंच मिलने से भारतीय निर्यात में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोत्तरी हो सकती है।

वहीं, यूरोपीय देशों को भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग के रूप में एक ऐसा बाजार मिलेगा जिसकी भरपाई अमेरिका नहीं कर सकता।

विशेषज्ञों ने कहा है कि अगर अमेरिका ने अपनी नीतियों में लचीलापन नहीं दिखाया, तो वह 21वीं सदी के सबसे बड़े व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा बनने से चूक जाएगा।

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