महा-चुनावी वर्ष 2026: क्या ममता बनाएंगी रिकॉर्ड और दक्षिण में खिलेगा कमल? भारत से लेकर विदेशों तक बदलने वाली है राजनीति की दिशा

क्या ममता बनाएंगी रिकॉर्ड और दक्षिण में खिलेगा कमल? भारत से लेकर विदेशों तक बदलने वाली है राजनीति की दिशा
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2026 का साल लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच एक निर्णायक महामुकाबला होगा।

साल 2026 वैश्विक राजनीति के लिए ऐतिहासिक होगा। भारत के 5 राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होंगे, जहा देश की 17% आबादी नई सरकार चुनेगी।

नई दिल्ली : साल 2026 भारत की आंतरिक राजनीति और वैश्विक कूटनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है। भारत में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहा देश की 17% से अधिक आबादी अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी।

यह साल भारतीय जनता पार्टी के लिए 'मिशन साउथ' और 'मिशन ईस्ट' की सबसे बड़ी परीक्षा है, क्योंकि यहा तीन राज्य ऐसे हैं जहा भाजपा आज तक अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है।

वहीं, वैश्विक स्तर पर बांग्लादेश से लेकर इजराइल तक, दुनिया के 36 देशों में आम चुनाव होने जा रहे हैं, जो भविष्य की नई विश्व व्यवस्था को परिभाषित करेंगे।

पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी का ऐतिहासिक लक्ष्य और भाजपा का मिशन इंपॉसिबल

पश्चिम बंगाल में 294 सीटों के लिए होने वाला चुनाव इस साल का सबसे हाई-वोल्टेज मुकाबला माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी कर एक नया रिकॉर्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं।

यदि वह जीतती हैं, तो वह भारत की पहली ऐसी महिला मुख्यमंत्री होंगी जिन्होंने लगातार चार कार्यकाल पूरे किए हों। वर्तमान में टीएमसी का मुख्य फोकस 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय गौरव पर है।

दूसरी ओर, भाजपा ने राज्य में अपने सांगठनिक ढांचे को और मजबूत किया है। केंद्रीय नेतृत्व यहा ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है।

पिछले चुनावों में 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 'डबल इंजन सरकार' के नारे के साथ बहुमत के जादूई आंकड़े (148) को पार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।

तमिलनाडु: द्रविड़ किलों के बीच सुपरस्टार विजय की राजनीतिक एंट्री

तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य पिछले 60 वर्षों से डीएमके और एआईएडीएमके के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। यहा वर्तमान मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में 'द्रविड़ मॉडल' की चर्चा है, लेकिन इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की पूरी संभावना है।

सुपरस्टार विजय की नई पार्टी 'तमिलगा वेट्री कझगम' ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। विजय विशेष रूप से युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को आकर्षित कर रहे हैं।

भाजपा भी यहा अन्नामलाई के नेतृत्व में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है और संभवतः एआईएडीएमके के साथ एक बड़े गठबंधन की तैयारी में है। यह चुनाव तय करेगा कि तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों का एकाधिकार बना रहता है या कोई नई ताकत उभरती है।

केरल: एलडीएफ का किला बचाने की जद्दोजहद और कांग्रेस की 'करो या मरो' की स्थिति

केरल भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहा वामपंथ की जड़ें अब भी मजबूत हैं। मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'सत्ता विरोधी लहर' और हालिया वित्तीय संकट है।

केरल में दशकों से हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज रहा है, जिसे विजयन ने 2021 में तोड़ा था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ इस बार पूरी ताकत के साथ वापसी की कोशिश कर रही है, क्योंकि राहुल गांधी के लिए भी केरल एक महत्वपूर्ण आधार है।

वहीं, भाजपा ने त्रिशूर लोकसभा सीट जीतकर यह साबित कर दिया है कि वह अब केरल में केवल 'वोट काटने वाली पार्टी' नहीं रही। भाजपा यहा ईसाई समुदाय और युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

असम: हिमंता बिस्वा सरमा का 'मिशन 100+' और हिंदुत्व का एजेंडा

असम में भाजपा अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए पूरी तरह आश्वस्त है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी और उसके सहयोगी दल 126 में से 100 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

भाजपा का मुख्य चुनावी मुद्दा घुसपैठ नियंत्रण, परिसीमन के बाद बदली हुई राजनीतिक स्थिति और 'स्वदेशी मुस्लिम' कार्ड है। सरकार ने पिछले पांच वर्षों में बुनियादी ढांचे और सड़क निर्माण में भारी निवेश किया है।

इसके विपरीत, कांग्रेस ने गौरव गोगोई के नेतृत्व में 10 क्षेत्रीय दलों का एक महागठबंधन तैयार किया है ताकि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोका जा सके। असम का यह चुनाव पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के वर्चस्व की निरंतरता को तय करेगा।

पुडुचेरी: एन. रंगासामी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की साख दांव पर

केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा और एआईएनआरसी गठबंधन की सरकार अपनी उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाएगी। मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता यहा के मुख्य चुनावी मुद्दे हैं।

पुडुचेरी रणनीतिक रूप से भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण भारत में उनके लिए 'प्रवेश द्वार' की तरह काम करता है। यहा मुख्य विपक्षी दल डीएमके और कांग्रेस ने मिलकर एक मजबूत मोर्चा बनाया है।

पुडुचेरी के चुनाव छोटे जरूर होते हैं, लेकिन यहाँ की 30 विधानसभा सीटों का परिणाम अक्सर केंद्र सरकार और राज्य सरकार के तालमेल पर निर्भर करता है। भाजपा यहाँ अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में आना चाहती है।

बांग्लादेश: शेख हसीना के बाद का अनिश्चित राजनीतिक भविष्य

भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में साल 2026 में होने वाले चुनाव पूरी दुनिया की नजरों में हैं। शेख हसीना के तख्तापलट और भारत में शरण लेने के बाद वहां की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।

अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में चुनाव कराने की तैयारी चल रही है। 12 फरवरी 2026 को होने वाले इन चुनावों में अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर संशय बरकरार है। विश्लेषकों का मानना है कि खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी और उनके बेटे तारिक रहमान इस बार सत्ता की चाबी संभाल सकते हैं।

35 वर्षों के बाद बांग्लादेश को अपनी दो प्रसिद्ध 'बेगमों' यानी हसीना और खालिदा के सीधे प्रभाव के बिना एक नई लीडरशिप मिलने की उम्मीद है, जिसका असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ेगा।

नेपाल और इजराइल: नए गठबंधन और युद्ध के बीच चुनावी अग्निपरीक्षा

नेपाल में 5 मार्च 2026 को होने वाले चुनाव एक नए संवैधानिक मोड़ पर खड़े हैं। वहा 'जेन-जी' द्वारा किए गए आंदोलनों ने पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को हिला दिया है। 10 कम्युनिस्ट पार्टियों के विलय से बनी नई 'नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी' इस बार प्रो-चाइना और प्रो-इंडिया सेंटिमेंट के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

इजराइल में बेंजामिन नेतन्याहू के लिए 'जीवन-मरण' का प्रश्न

गाजा और लेबनान में चल रहे युद्ध के बीच इजराइली जनता सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के मुद्दे पर वोट करेगी। नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप और युद्ध को लंबा खींचने के दावों के बीच, विपक्षी नेता यायर लापिड और बेनी गैंट्ज़ उनकी कुर्सी के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।

वैश्विक चुनावी रुझान: यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की बदलती हवाएं

दुनिया भर के 36 देशों में होने वाले ये चुनाव वैश्विक दक्षिण और पश्चिमी देशों के बीच शक्ति संतुलन को बदल सकते हैं। यूरोप में स्वीडन, हंगरी और पोलैंड जैसे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों का प्रभाव बढ़ रहा है, जो प्रवासन को मुख्य मुद्दा बना रही हैं।

अफ्रीका में युगांडा और मोरक्को जैसे देशों में आर्थिक सुधारों और लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदान होगा। दक्षिण अमेरिका में ब्राजील और कोलंबिया में होने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि लैटिन अमेरिका में 'लेफ्ट' का प्रभाव बना रहेगा या दक्षिणपंथी पार्टियां वापसी करेंगी।

कुल मिलाकर, 2026 का साल दुनिया भर में लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच एक निर्णायक महामुकाबला साबित होने वाला है।


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