video: आवारा श्वान बनाम सिस्टम- सुप्रीम कोर्ट में गरम बहस, जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल

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आवारा कुत्तों के बढ़ते हमले राष्ट्रीय संकट बने। सुप्रीम कोर्ट में गरम बहस, पशु अधिकार बनाम आम आदमी की सुरक्षा पर हरिभूमि–INH की विशेष चर्चा, देखिए पूरा वीडियो।

भारत की सड़कों पर बढ़ते आवारा कुत्तों के हमले अब महज़ स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुके हैं। विधायिका और कार्यपालिका की सुस्ती के बाद अब इस गंभीर मुद्दे पर Supreme Court of India को हस्तक्षेप करना पड़ा है।

देश में अनुमानित 6 करोड़ आवारा कुत्ते हैं। हर साल 36 लाख से ज्यादा लोग घायल होते हैं और रोज़ाना करीब 10 हजार हमले- ये आंकड़े बताते हैं कि शहरों की सड़कें आम नागरिक के लिए कितनी असुरक्षित हो चुकी हैं।

78 साल बाद भी सुरक्षा के लिए कोर्ट का सहारा?

आजादी के 78 साल बाद अगर आम आदमी को सड़क पर सुरक्षित चलने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़े, तो यह प्रशासनिक विफलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। लोकतंत्र के तीनों स्तंभों- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की अपनी जिम्मेदारियां हैं। जब बुनियादी कर्तव्यों का निर्वहन नहीं होता, तब न्यायपालिका को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है।

पिछले तीन दिनों से सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस इसी तंत्रगत शिथिलता का परिणाम है।

नसबंदी-टीकाकरण: कागज़ों तक सीमित योजनाएं

सरकारी स्तर पर नसबंदी और टीकाकरण जैसे अभियान घोषित तो होते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इनका असर बेहद सीमित है। नतीजा, तेज़ी से बढ़ती श्वान आबादी और बढ़ते हमले।

शेल्टर होम का प्रस्ताव: व्यवहारिक या चुनौतीपूर्ण?

न्यायपालिका ने शेल्टर होम का विचार रखा है, लेकिन भारत जैसे देश में यह व्यावहारिक रूप से कठिन माना जा रहा है।

जहां एक ही पते पर 100–100 लोग रहने को मजबूर हैं और लाखों लोग फुटपाथों पर रात बिताते हैं, वहां करोड़ों जानवरों के लिए अलग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना तंत्र के लिए टेढ़ी खीर है।

पशु प्रेम बनाम आम आदमी की सुरक्षा

इस बहस में पशु प्रेमी भी एक अहम पक्ष हैं, जो कुत्तों को हटाने या सख्ती का विरोध कर रहे हैं। ऐसे में मूल प्रश्न Right to Life (जीवन का अधिकार) का है-

क्या पशु प्रेम मासूम बच्चों और नागरिकों की जान से बढ़कर है?

न्यायपालिका के सामने चुनौती है कि पशु क्रूरता से बचाव और नागरिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे साधा जाए?

हरिभूमि–INH की विशेष ‘चर्चा’

इसी ज्वलंत मुद्दे पर हरिभूमि व INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने एक विशेष चर्चा की।

इस खास पेशकश में शामिल हुए प्रमुख वक्ता

  • भानु प्रताप शर्मा (पूर्व सांसद)
  • मनोज गोरकेला (वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)
  • संजय मोहपात्र (एनिमल एक्टिविस्ट)
  • डॉ. सतपाल सिंह (पशु चिकित्सक)

बड़ा सवाल-

श्वान पर बहस जारी- जिम्मेदारी किसकी?

प्रशासन की?

नगर निकायों की?

या फिर समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी?

किसने क्या कहा?

इस पूरी बहस को विस्तार से समझने के लिए देखिए पूरा वीडियो, जहां हर पक्ष ने अपनी दलीलें, समाधान और चेतावनियां खुलकर रखीं।

यह बहस सिर्फ कुत्तों की नहीं, बल्कि शहरों की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और मानवीय संतुलन की है। समाधान तभी संभव है जब नीतिगत निर्णय, जमीनी क्रियान्वयन और सामाजिक सहयोग- तीनों एक साथ आगे बढ़ें।

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