भोपाल में मोहन भागवत: संघ प्रमुख बोले- सद्भावना ही कर सकती है समाज को जोड़ने और चलाने का काम

संघ प्रमुख बोले- सद्भावना ही कर सकती है समाज को जोड़ने और चलाने का काम
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने समाज को जोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने समाज को जोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय समाज का स्वाभाविक गुण रहा है। आज के समय में समाज को दिशा देने के लिए सज्जन शक्ति का जागरण, पंच परिवर्तन का आचरण और निरंतर संवाद अत्यंत आवश्यक है।

यह आयोजन दो सत्रों में संपन्न हुआ। प्रथम सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण के साथ किया गया। मंच पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के साथ प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा और मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय उपस्थित रहे। बैठक की खास बात यह रही कि मध्यभारत प्रांत के 16 शासकीय जिलों से समाज के विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने इसमें सहभागिता की।

अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि “समाज” का अर्थ ही है समान लक्ष्य की ओर बढ़ने वाला समूह। भारतीय समाज की अवधारणा सदैव ऐसी रही है, जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में संतुलित और सुखी हो। हमारे ऋषि-मुनियों ने यह समझा कि अस्तित्व एक है, केवल उसे देखने की दृष्टि अलग-अलग है। उसी चिंतन, तपस्या और साधना से राष्ट्र और संस्कृति की नींव रखी गई।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़कर रखने का कार्य सद्भावना ही करती है। भारत की पहचान विविधता में एकता है। बाहरी रूप से भिन्नता हो सकती है, लेकिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं। इसी भाव को स्वीकार करने वाला समाज हिंदू समाज है। डॉ. भागवत ने कहा कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है, जो मत, पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर टकराव नहीं करता।

सरसंघचालक ने यह भी कहा कि समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को अलग बताने के प्रयास हुए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हजारों वर्षों से इस भूमि पर रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सद्भाव केवल संकट के समय नहीं, बल्कि हर समय बनाए रखना चाहिए। मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को समझना सद्भाव की पहली सीढ़ी है। समर्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह दुर्बल की सहायता करे।

पहले सत्र में पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सभी समाज अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन यह आत्ममंथन भी जरूरी है कि हमने राष्ट्र को क्या दिया। उन्होंने संघ और शिव के भाव में समानता बताते हुए कहा कि जैसे शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए विष पिया, वैसे ही संघ भी आरोपों का विष पीकर संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है।

उन्होंने कहा कि जन्म किसी भी जाति में हुआ हो, पहचान अंततः हिंदू, सनातनी और भारतीय की ही होती है। हर भारतीय में राष्ट्रोत्थान और समाजोत्थान की अद्भुत क्षमता है। धर्मांतरण को उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला गंभीर षड्यंत्र बताते हुए समाज को इसके प्रति सजग रहने का आह्वान किया।

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