भोपाल/खंडवा। धार्मिक दृष्टि से 17 अप्रैल का दिन मध्यप्रदेश के लिए बेहद खास रहा। खंडवा जिले के ओंकारेश्वर स्थित एकात्म धाम में 5 दिवसीय 'एकात्म पर्व' की शुरुआत हुई। इस कार्यक्रम में पहले दिन प्रवचनों की धारा बही। संतों ने एकात्म पर मानव की आंख खोलने की कोशिश की। कार्यक्रम की शुरुआत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। इस मौके पर उन्होंने एकात्म पर्व पर आधारित प्रदर्शनी की अवलोकन भी किया। कार्यक्रम में श्री द्वारका शारदा पीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज सहित कई संत और शिष्य उपस्थित थे।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भगवान शंकराचार्य के कारण मध्यप्रदेश की धरा धन्य हुई। इस धाम में चेतना का अहसास अनायास ही हो रहा है। परमात्मा की दया से मध्यप्रदेश अद्भुत धरती है। अगर श्रीराम के युग से स्मरण करें तो भगवान वनवास के समय चित्रकूट के धाम पर आए। भगवान ने मध्यप्रदेश के जरिये राम राज्य स्थापित किया। भगवान ने बताया कि पारिवारिक रिश्ते कैसे हों, शासन के सूत्र कैसे हों।
कर्मवाद पर आधारित जीवन हमारी प्रेरणा
सीएम डॉ. यादव ने कहा कि 5 हजार पहले कंस को मारने के बाद भगवान कृष्ण उज्जैयनी में आए। उन्होंने सांदीपनि आश्रम में अलग ही तरह का जीवन-यापन किया। उनका कर्मवाद पर आधारित जीवन हमें प्रेरणा देता है। इसी तरह कठिन काल में केरल से चलकर आदि गुरु शंकराचार्य बालक के रूप में शंकर बनकर एकात्म धाम पर आते थे। हम युगों-युगों तक उन्हें स्मरण करते रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता की व्यवस्था का सनातन-संस्कृति का गठबंधन किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन में भी एकात्मवाद दिखाई देता है।भौतिक सुख से ज्यादा महत्व आत्मिक सुख का है। सनातन संस्कृति युगों-युगों से जानी जाती है। हमारी संस्कृति केवल लेने की नहीं है, बल्कि देने की है।
उन्होंने कहा कि पंचतत्वों से बना हुआ शरीर ही हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। परमात्मा की कृपा से इस तरह के कार्यक्रम अनवरत जारी हों। मैं इसके लिए सभी संतों का अभिनंदन करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में आज मध्यप्रदेश सुशासन के साथ-साथ सनातन संस्कृति और एकात्मता के संदेश को साकार कर रहा है। साथ ही, 'एकात्म पर्व' हम सभी के लिए गर्व, प्रेरणा और आत्मिक समृद्धि का अवसर बनकर हमें धन्य करेगा।
जो कर सको, इसी जन्म में कर लो
श्री द्वारका शारदा पीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि अनेकता के लिए कोई प्रमाण नहीं चाहिए, हम विचारों-मुख मंडल से, स्वभाव से भी अलग है। तो एकता कैसे सिद्ध करेंगे। यदि इसी जन्म में जान लिया तो ठीक है, जरूरी नहीं कि मनुष्य का शरीर आपको दोबारा मिले। भगवान शंकराचार्य कहते हैं कि प्राणी मात्र में परमात्मा का दर्शन करने वाला अमृत्व को प्राप्त कर लेता है। वही एकात्मा सिद्ध कर सकता है।
हम सब हैं सच्चिनांद स्वरूप
उन्होंने कहा कि आत्मबोध होना चाहिए। ब्रह्म-भगवान-आत्मा तीनों एक हैं। मानव सबकुछ जानना चाहता है, लेकिन अपने आप को जानना नहीं चाहता। यही विचार करने और जानने योग्य बात है। उन्होंने कहा कि हमें तत्व को समझना चाहिए। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा लक्ष्य क्या है, उस लक्ष्य को प्राप्त करने का उपाय क्या है। यह जानना जरूरी है। हम सब सच्चिनांद स्वरूप हैं। ये जगत भोग-विलास के लिए नहीं है, बल्कि जगदीश्वर को प्राप्त करने के लिए है। हमें वेदों का पालन करना चाहिए।
सभी के साथ अपनेपन का व्यवहार करें
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की न्यासी पद्मश्री निवेदिता भिड़े ने कहा कि मैं चराचर को व्याप्त करने वाली आत्म चेतना हूं। हम सब की आत्मा एक है। हम सब आत्मरूप से एक हैं। मनुष्य शरीर एकात्मता का सुंदर उदाहरण है। इसमें भी अलग-अलग खंड होते हुए चेतना एक है। आज क्वेंटम फिजिक्स, पर्यावरणविद और विज्ञान आज वेदों को समझ रहा है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि सत्य समाज के अनुसार नहीं ढलता, बल्कि समाज को सत्य के हिसाब से ढलना पड़ता है। एकात्मता अस्तित्व का सत्य है। जब मानवता इसके विरुद्ध गई तो समस्याएं खड़ी हो गईं। आज विश्व एकात्मवाद को समझना चाहता है। हर क्षेत्र का अंत एकात्म पर ही होता है। हमारे धर्म का आधार एकात्मवाद ही है। हमें सभी के साथ अपनेपन का व्यवहार करना चाहिए। हमारी वाली सभी को जोड़ने वाली हो, तोड़ने वाली नहीं।