जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सरकारी वकीलों की हालिया नियुक्तियों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार और महाधिवक्ता कार्यालय से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत उत्तर प्रस्तुत किया जाए। निर्धारित तारीख पर जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर न्यायालय ने असंतोष व्यक्त किया। यह मामला सरकारी विधि अधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधानिकता से जुड़ा हुआ है, जिस पर अब न्यायिक निगरानी शुरू हो गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता योगेश सोनी ने अदालत को अवगत कराया कि पूर्व में जारी नोटिस संबंधित सभी अधिकारियों तक पहुंचा दिए गए थे। उन्होंने यह भी बताया कि जिन अधिकारियों ने नोटिस स्वीकार करने से इनकार किया, उसका उल्लेख शपथ-पत्र में किया गया है। इसके बावजूद अब तक राज्य की ओर से कोई आधिकारिक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया, जो न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्देश दिया कि महाधिवक्ता प्रशांत सिंह स्वयं इस प्रकरण में राज्य सरकार का पक्ष रखें। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगली सुनवाई पर जवाब दाखिल करना अनिवार्य होगा और इसमें किसी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी। यह निर्देश इस बात का संकेत है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से ले रहा है और नियुक्तियों की प्रक्रिया पर स्पष्टता चाहता है।
याचिका में 25 दिसंबर को जारी उस सूची को चुनौती दी गई है, जिसमें 157 सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति का उल्लेख है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि चयन प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं अपनाई गई। वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना के अनुसार सरकारी अधिवक्ता बनने के लिए कम से कम 10 वर्ष का विधिक अनुभव आवश्यक है। याचिका में कहा है कई वकीलों को कम अनुभव के बाद भी पद दे दिया गया।
इसके अलावा, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठाए गए। बताया गया कि बड़ी संख्या में वकीलों से निर्धारित प्रारूप में आवेदन तो आमंत्रित किए गए, लेकिन उनकी जांच और मूल्यांकन किस आधार पर हुआ, यह सार्वजनिक नहीं किया गया। न तो चयन के मापदंड घोषित किए गए और न ही अंकों या अस्वीकृति के कारणों की जानकारी साझा की गई। याचिका हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जबलपुर के संयुक्त सचिव ने दायर की है।