मध्यप्रदेश की बिजली कंपनियों को 9 साल में 34,561 करोड़ का घाटा हुआ है। अब 10.19% दर वृद्धि का प्रस्ताव, स्मार्ट मीटर पर भी विवाद। जानिए क्या है पूरा मामला।

भोपाल। मध्यप्रदेश की तीनों विद्युत वितरण कंपनियां पिछले लगभग नौ सालों से आर्थिक दबाव झेल रही हैं। वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2024-25 के बीच इन कंपनियों को कुल करीब 34,561 करोड़ रुपए का संचयी घाटा हुआ है। विधानसभा में ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। आंकड़ों के अनुसार, पूर्व और मध्य क्षेत्र की कंपनियों को लगातार अधिक नुकसान हुआ, जबकि पश्चिम क्षेत्र की कंपनी ने कुछ वर्षों में लाभ कमाकर स्थिति को आंशिक रूप से संतुलित किया।

पश्चिम क्षेत्र का अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन
पश्चिम क्षेत्र वितरण कंपनी ने चार वर्षों में मुनाफा दर्ज किया, जिनमें 2019-20 और 2024-25 प्रमुख रहे। हालांकि उसे भी दो वर्षों में नुकसान उठाना पड़ा। फिर भी अन्य क्षेत्रों की तुलना में इसकी वित्तीय स्थिति कुछ बेहतर मानी जा रही है। बताया गया कि इस क्षेत्र में आय में लगभग 10.19 प्रतिशत की दर वृद्धि दर्ज की गई, जिससे राजस्व में सुधार हुआ।

दर वृद्धि प्रस्ताव पर सियासी घमासान
राजस्व घाटे और बढ़ते खर्च को देखते हुए बिजली कंपनियों ने औसतन 10.19 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाने का प्रस्ताव नियामक आयोग के सामने रखा है। विपक्षी विधायक राहुल सिंह ने आरोप लगाया कि प्रबंधन की कमजोरियों और अधिक लाइन लॉस का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है। जब तक तकनीकी और वाणिज्यिक हानियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाएगा, तब तक दर वृद्धि से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

स्मार्ट मीटर को लेकर विवाद
स्मार्ट मीटर स्थापना को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। मंत्री तोमर ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं से स्मार्ट मीटर लगाने के लिए कोई अलग शुल्क नहीं लिया जा रहा। साथ ही यह भी कहा कि मीटर बदलने के लिए उपभोक्ता की सहमति आवश्यक नहीं है। हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का दावा है कि स्मार्ट मीटर की लागत लीज और रखरखाव शुल्क के रूप में आगामी वर्षों में टैरिफ में जोड़ी जाएगी। वर्ष 2026-27 के लिए करीब 820 करोड़ की मांग नियामक आयोग के समक्ष रखी गई है। 

अब आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सब्सिडी की प्रतिपूर्ति समय पर नहीं हुई और लाइन लॉस कम नहीं हुआ, तो वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है। दर वृद्धि बनाम संरचनात्मक सुधार की बहस अब तेज होती दिख रही है। सरकार सुधारात्मक कदमों-जैसे स्मार्ट मीटरिंग, वसूली सुदृढ़ीकरण और तकनीकी उन्नयन-का हवाला दे रही है, जबकि विपक्ष इसे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बता रहा है।