इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने जावरा और नागदा नगर परिषद के अध्यक्षों के वित्तीय अधिकारों पर अंतरिम रोक लगाते हुए सख्त संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक संबंधित जनप्रतिनिधि किसी भी प्रकार के वित्तीय फैसले या लेनदेन नहीं कर सकेंगे। इस आदेश का सीधा असर स्थानीय निकायों के कामकाज पर पड़ने की संभावना है। जावरा और नागदा नगर परिषद से जुड़े मामलों में याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि चुनाव के बाद अध्यक्ष पद की अधिसूचना समय पर जारी नहीं की गई।
कोर्ट ने नोटिस जारी कर मांगा जवाब
इसी आधार पर अध्यक्षों की वैधानिक स्थिति पर सवाल उठाए गए। कोर्ट ने पूर्व में लंबित एक समान मामले का हवाला स्वीकार करते हुए शुरुआती स्तर पर ही राहत देते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। अदालत ने दोनों मामलों में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि तय प्रक्रिया के तहत समयसीमा में जवाब दाखिल करना होगा। यदि निर्धारित अवधि में प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तो याचिका स्वतः निरस्त मानी जा सकती है। कोर्ट के निर्देश के अनुसार 7 दिन के भीतर प्रक्रिया शुल्क जमा करना होगा।
बिना अधिसूचना वित्तीय अधिकार नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि जब तक किसी निर्वाचित अध्यक्ष को विधिवत अधिसूचना के जरिए पद की पुष्टि नहीं होती, तब तक उसे वित्तीय अधिकारों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस फैसले का असर नगर परिषदों के विकास कार्यों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वित्तीय मंजूरी के बिना कई योजनाएं अटक सकती हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहला मामला नहीं है।
प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल
इससे पहले पानसेमल, श्योपुर और डबरा जैसे निकायों में भी इसी तरह के विवाद सामने आ चुके हैं। पानसेमल, श्योपुर और डबरा के मामलों में भी चुनाव के बाद अधिसूचना जारी करने में देरी के चलते कानूनी पेचीदगियां बढ़ीं और मामला अदालत तक पहुंचा। पूरा मामला प्रशासनिक स्तर पर हुई चूक की ओर इशारा करता है, जिसका असर अब जनप्रतिनिधियों और स्थानीय शासन व्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। आने वाली सुनवाई में कोर्ट का अंतिम निर्णय कई अन्य निकायों के लिए भी दिशा तय कर सकता है।