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MP News: मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार आदिवासी समुदाय को जल, जंगल और जमीन का अधिकार देने जा रही है। सरकार ने मंडला-डिंडौरी और छिंदवाड़ा की 33 बस्तियों को हेबिटेट राइट्स की मान्यता दी है। इनमें  21 बैगा बहुल और 12 बस्तियां भारिया बहुल हैं। हेबिटेट राइट मिलने से यहां के लोग जल, जंगल और जमीन सहित अन्य संसाधनों का उपयोग अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए कर सकेंगे। अगली पीढ़ी को भी परिसम्पत्तियां वसीयत के रूप में दे सकेंगे। 

जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने बताया, वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत पीवीटीजी की बसाहटों का संरक्षण किया जा रहा है। सरकार ने डिण्डौरी जिले की 7 और मंडला जिले की 14, बैगा बहुल बसाहटों के हेबिटेट राइट की मान्यता दी है। इसी तरह छिंदवाड़ा जिले में 12 भारिया जनजाति बहुल बसाहटों के हेबिटेट राइट को भी मान्यता दी गई है। 

हेबिटेट राइट से होंगे यह फायदे 
हेबिटेट राइट यानी पर्यावास अधिकार मिलने से इन जनजातियों को उनकी पारम्परिक आजीविका स्त्रोत और पारिस्थितिकीय ज्ञान को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। शासकीय योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के जरिए भी इनका जीवन स्तर सुधारने में मदद मिलेगी। क्योंकि, अभी जमीन का मालिकाना हक न मिलने से आवास सड़क जैसी कई सुविधाओं से वंचित रह जाते थे। 

सकारात्मक बदलाव की उम्मीद 
जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने बताया, हैबिटेट राइट्स मिलने से पिछड़ी जनजातियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएंगे। वह जंगलों में अपनी आजीविका को बेहतर तरीके से चला सकेंगे और आगामी पीढ़ियों को यह धरोहर सौंप सकेंगे। हेबिटेट राइट मिलने से यह जनजातियां न केवल जल, जंगल, जमीन और जानवर का संरक्षण करने में सक्षम होंगे। बल्कि, अपनी खेती, औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए स्वतंत्र होंगे। 

जंगल पर आश्रित है आदिवासियों का जीवन 
मध्य प्रदेश के सुदूर वन क्षेत्र में बसीं बैगा और भारिया जनजातियां अपनी परम्परागत जीवन शैली के लिए विख्यात हैं। पिछड़े और कमजोर जनजातियों में शामिल इन समुदायों को न अपनी जमीन का मालिकाना का हक मिला था और न ही जंगल पर नियंत्रण था। जबकि, इनकी जीवन शैली पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। जंगल इनकी आजीविका का मुख्य साधन हैं। 

संस्कृति बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास 
बैगा और भारिया समुदाय जल-जंगल, जमीन और देशज संस्कृति की सुरक्षा की मांग कर रहे थे। सरकार ने इनकी मांगों को गंभीरता से लेते हुए 33 बसाहटों को हैबिटेट राइट्स को मान्यता दी है। हैबिटेट राइट केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि इन पीवीटीजी की मूल पहचान और प्राकृतिक संस्कृति को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।  

डिंडौरी के 7 गांवों में पहली बार मिला हेबीटेट राइट्स
डिंडौरी जिले के बैगा चक क्षेत्र के ढावा, जिलंग, रजनी, सरई, धुरकुटा, लमौटा, सिलपिडी गांव को हैबीटेट राइट्स में दिए गए थे। देश के किसी गांव को हेबीटेट राइट्स देने का यह पहला मामला था। हेबीटेट राइट्स देश की विशेष संरक्षित 72 जातियों को दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता नरेश विश्वास ने कहा, हैबीटेट राइट्स को सरकार इसे उपलब्धि जरूर बता रही है, लेकिन 2015 में  डिंडौरी के जिन 7 गांवों को यह अधिकार मिले थे, वहां अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।