भोपाल में सैकड़ों ऐसी चश्मे की दुकानें हैं, जिनमें बिना डॉक्टर या प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट के आंखों की जांच की जा रही है। गलत पावर के चश्मे से लोगों में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

भोपाल। आंखों की जांच नियमानुसार प्रशिक्षित व्यक्ति को ही करनी चाहिए लेकिन भोपाल में आंखों की जांच की ऐसी बेहिसाब दुकानें खुली हैं, जहां कोई प्रशिक्षित व्यक्ति नहीं है, लेकिन चश्मे का नंबर देने, चश्मा बनाने और यहां तक की आंखों से जुड़ी समस्याओं का उपचार धड़ल्ले से किया जा रहा है। इन ऑप्टिकल्स में कोई डॉक्टर या प्रशिक्षत सहायक नहीं होता।

जब कोई वहां चश्मा बनवाता है, तो आंखों में जलन, पानी आने या बार-बार नंबर सही नहीं बैठने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। हमें जब कभी कोई दिक्कत होती है, तो हम आसपास के ही किसी ऑप्टिकल्स से नजर की जांच कराकर चश्मा बनवा लेते हैं। लेकिन हमारी यह आदत सुधार की जगह परेशानी बढ़ा देती है।  

इस मामले में कोई स्पष्ट नियम नहीं : डॉ शर्मा
सीएमएचओ डॉ. मनीश शर्मा कहते हैं कि इस मामले कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं कि स्वास्थ्य विभाग इनकी जांच कर सके। यह एक परेशानी है। इस मामले में ज्यादातर लोग शिकायतें भी नहीं करते। अगर शिकायतें आएं तो कुछ हो सकता है।

उन्होंने कहा चश्मे के नंबर देने का अधिकार सिर्फ डॉक्टर को होता है। नंबरों की जांच के लिए दो साल का एक ऑप्टोमैट्रिक्स डिप्लोमा कोर्स होता है। लेकिन शहर में खुले ज्यादातर ऑप्टिकल्स में ऐसा कोई प्रशिक्षित व्यक्ति नहीं होता।

गलत पावर के चश्मे से बढ़ जाती है समस्या
ऐसे उपाय अपनाने से आंखों की तकलीफ खत्म होने की जगह परेशानी और बढ़ जाती है। बाद में जब आप एम्स, गांधी मेडिकल कॉलेज या फिर किसी प्रशिक्षित चिकित्सक के पास जाते हैं तो पता चलता है कि उसे चश्मेवाले ने पावर का चश्मा दिया था।

इसी वजह से उसे एम्ब्लियोपिया, जिसे आम भाषा में ‘लैजी आई’ कहा जाता है, की समस्या हो गई। शहर में बड़ी संख्या में चल रही चश्मे की दुकानों में प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट के बजाय सामान्य कर्मचारी ही आंखों की जांच कर रहे हैं। इनमें से कई के पास कोई मान्यता प्राप्त डिग्री या डिप्लोमा नहीं है। 

अप्रशिक्षित लोग मशीन से निकालते हैं नंबर
ऐसे अप्रशिक्षित लोग मशीन के सहारे नंबर निकालकर तुरंत चश्मा तैयार कर देते हैं। भोपाल में ऐसी दुकानों की संख्या सैकड़ों में है। विशेषज्ञों का कहना है कि दृष्टि परीक्षण एक तकनीकी प्रक्रिया है, जिसके लिए विधिवत प्रशिक्षण आवश्यक होता है।

चिंता की बात यह भी है कि कुछ दुकानदार सिर्फ चश्मा बनाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि आंखों की बीमारियों में दवा भी सुझाने लगते हैं। मोतियाबिंद, काला पानी (ग्लूकोमा) या मधुमेह से रेटिना पर असर जैसी गंभीर स्थितियों में भी लोग पहले ऑप्टिकल शॉप पर पहुंच जाते हैं। 

प्रशिक्षित व्यक्ति से ही कराएं आंखों का इलाज 
बिना विशेषज्ञ परामर्श के दी गई दवाएं स्थिति को और जटिल बना सकती हैं। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कई कर्मचारी वर्षों के अनुभव का हवाला देकर डिग्री की जरूरत से ही इनकार करते हैं। कुछ ने स्वीकार किया कि उन्हें मशीन चलाना दुकान मालिक ने सिखाया है और वही आधार बनाकर वे जांच कर रहे हैं।

यह प्रवृत्ति मरीजों के लिए जोखिम भरी साबित हो सकती है। गलत नंबर का चश्मा पहनने से लगातार सिरदर्द, आंखों में तनाव और कभी-कभी भेंगापन तक हो सकता है। 

लेंस का पावर सही न होना बड़ी परेशानी
लेंस का पावर या ऑप्टिकल सेंटर सही न हो तो वस्तुएं टेढ़ी या डगमगाती दिख सकती हैं। ज्यादा अंतर होने पर धुंधलापन बढ़ जाता है, यहां तक कि दोहरी छवि भी दिखाई दे सकती है। अगर ज्यादा समय तक ऐसे चश्मों का उपयोग किया जाए तो स्थायी रूप से नजर कमजोर होने का खतरा पैदा हो जाता है।

वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि चश्मे का नंबर तय करने का अधिकार केवल योग्य चिकित्सक या प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट को है, जिन्होंने संबंधित पाठ्यक्रम पूरा किया हो। स्वास्थ्य अधिकारियों का भी मानना है कि नियमों की स्पष्ट व्यवस्था और शिकायत तंत्र के अभाव में इस तरह की अनियमितताएं जारी हैं।