MP News: गोबर-गौमूत्र पर करोड़ों खर्च, नतीजा शून्य, मध्य प्रदेश की पंचगव्य परियोजना पर उठे बड़े सवाल

Panchgavya cancer research Project MP News
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मध्य प्रदेश की पंचगव्य कैंसर शोध परियोजना पर फंड के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। 

मध्य प्रदेश की पंचगव्य कैंसर शोध परियोजना पर फंड के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। गोबर-गौमूत्र पर करोड़ों खर्च और 14 साल में कोई ठोस नतीजा नहीं आया, जांच जारी। अधिक जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर।

भोपाल। प्रदेश सरकार की एक महत्वाकांक्षी शोध योजना इस समय विवादों के केंद्र में आ गई है। यह योजना गाय से प्राप्त गोबर, गौमूत्र, दूध, दही और घी जैसे पदार्थों के जरिए कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज की संभावनाओं को परखने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में संचालित इस परियोजना को लेकर अब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या शोध के नाम पर सरकारी धन का सही उपयोग हुआ या नहीं। वर्ष 2011 में शुरू की गई इस योजना को पंचगव्य परियोजना कहा गया, जिसमें गोबर, गौमूत्र, दूध, दही और घी जैसे पदार्थों के औषधीय गुणों की वैज्ञानिक जांच की जानी थी। राज्य सरकार ने इसके लिए करीब 3.5 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की थी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या यह पारंपरिक मिश्रण कैंसर और अन्य गंभीर रोगों के इलाज में वास्तव में कारगर हो सकता है।

कार्यप्रणाली पर खड़े किए गंभीर सवाल

हालांकि, अब सामने आए जांच के निष्कर्षों ने इस परियोजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक जांच में यह पाया गया कि 2011 से 2018 के बीच केवल कच्चे माल और उनके भंडारण पर ही लगभग 1.92 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए। जांच अधिकारियों के अनुसार, जिन सामग्रियों पर इतना खर्च दिखाया गया है, उनकी वास्तविक कीमत इससे कहीं कम होनी चाहिए थी। अनुमान है कि यही सामग्री 15 से 20 लाख रुपए में आसानी से उपलब्ध हो सकती थी। इसके अलावा, जांच में यह भी उजागर हुआ है कि परियोजना के बजट से ऐसे खर्च किए गए, जिनका शोध से सीधा संबंध नहीं दिखता। एक महंगी गाड़ी की खरीद, उसके ईंधन और रखरखाव पर लाखों रुपए खर्च, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर भारी राशि, साथ ही गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों की हवाई यात्राएं-इन सभी खर्चों की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं।

14 साल चले शोध का कोई नतीजा सामने नहीं आया

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि करीब 14 साल तक चलने के बावजूद इस परियोजना से कैंसर उपचार के क्षेत्र में कोई ठोस वैज्ञानिक उपलब्धि सामने नहीं आई। न तो किसी नई उपचार पद्धति को मान्यता मिली और न ही ऐसे नतीजे आए, जिन्हें चिकित्सा जगत में स्वीकार किया जा सके। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों का कहना है कि परियोजना का समय-समय पर ऑडिट हुआ है और सभी खरीद सरकारी नियमों के तहत की गई हैं। उनका यह भी दावा है कि परियोजना के माध्यम से किसानों और युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। फिलहाल, इस पूरे मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट पर मंडलायुक्त द्वारा समीक्षा की जानी है। इसके बाद ही यह तय होगा कि इस प्रकरण में आगे कानूनी कार्रवाई होगी या नहीं। यह मामला एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि सार्वजनिक धन से चलने वाली शोध परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है।

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