छत्रपति हत्याकांड की सुनवाई: राम रहीम के वकीलों ने चंडीगढ़ हाईकोर्ट में 'सीलबंद गोली' की जांच पर खड़े किए गंभीर सवाल

Ram Rahim
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राम रहीम की अपील पर हाईकोर्ट में सुनवाई। 

उम्रकैद की सजा काट रहे राम रहीम की अपील पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में तीखी बहस हुई। वकीलों ने कोर्ट में बड़ा सवाल उठाया कि जब पोस्टमार्टम से निकली गोली का कंटेनर साल 2011 तक ट्रायल कोर्ट में 'सीलबंद' था, तो उससे पहले ही फोरेंसिक लैब ने उसकी जांच कैसे कर ली।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में दोषी करार दिए जाने के सात साल बाद मामला एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में राम रहीम की उम्रकैद की सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के दावों पर तीखा हमला किया। वकीलों ने मुख्य रूप से बैलिस्टिक रिपोर्ट को विरोधाभासी और तथ्यों से परे बताया है।

सीलबंद पार्सल और एफएसएल जांच

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ के सामने बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकील आर. बसंत और आरएस राय ने दलीलें पेश कीं। बचाव पक्ष का सबसे बड़ा तर्क उस 'गोली' को लेकर था, जो पोस्टमार्टम के दौरान रामचंद्र छत्रपति के शरीर से निकाली गई थी।

वकीलों ने अदालत को बताया कि 22 नवंबर 2002 को दिल्ली के एम्स (AIIMS) में पोस्टमार्टम के समय जो गोली बरामद हुई थी, उसे एक प्लास्टिक के डिब्बे में रखकर एम्स की आधिकारिक मुहर के साथ सील कर दिया गया था। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जब 16 अप्रैल 2011 को ट्रायल कोर्ट के सामने यह पार्सल खोला गया, तब भी वह पूरी तरह सीलबंद था। बचाव पक्ष ने सवाल उठाया कि यदि गोली का पार्सल ट्रायल कोर्ट में खुलने तक सील था, तो फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) के विशेषज्ञ ने पहले इसकी जांच कैसे कर ली?

बैलिस्टिक परीक्षण के दावे स्व-विरोधी

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष का यह दावा पूरी तरह से झूठा और स्व-विरोधी है कि इस गोली का पहले परीक्षण किया गया था। यदि मुहरबंद कंटेनर केवल अदालत के आदेश पर 2011 में खोला गया तो उससे पहले किसी भी विशेषज्ञ द्वारा दी गई रिपोर्ट कानूनी रूप से संदिग्ध हो जाती है। वकीलों ने कहा कि यह प्रक्रियात्मक चूक पूरे मामले की नींव को हिला देने वाली है।

एक और तकनीकी बिंदु पर हुई गरमागरम बहस

सुनवाई के दौरान एक और तकनीकी बिंदु पर गरमागरम बहस हुई। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि एफएसएल विशेषज्ञ ने रिवॉल्वर के अलग-अलग हिस्सों जैसे ड्रम और बैरल के साथ-साथ बरामद गोली पर भी अपने हस्ताक्षर किए थे।

बचाव पक्ष ने इस दावे को पूरी तरह 'कृत्रिम और असंभव' करार दिया। उनके अनुसार, शरीर से बरामद एक छोटी और विकृत (Deformed) गोली पर किसी भी प्रकार के हस्ताक्षर या उत्कीर्णन करना भौतिक रूप से मुमकिन नहीं है। उन्होंने दलील दी कि हथियार की नली पर तो निशान बनाए जा सकते हैं, लेकिन मानव शरीर से निकली क्षतिग्रस्त गोली पर सूक्ष्म हस्ताक्षर करना विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

हथियार और कारतूस के बीच बेमेल होने का आरोप

बचाव पक्ष ने केवल सीलिंग की प्रक्रिया पर ही नहीं, बल्कि अपराध में इस्तेमाल हथियार की प्रमाणिकता पर भी उंगली उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि जो गोलियां बरामद होने का दावा किया गया है, उनका आकार, स्थिति और प्रकृति उस रिवॉल्वर से मेल नहीं खाती जिसे 'मर्डर वेपन' बताया जा रहा है।

वकीलों ने जोर देकर कहा कि बैलिस्टिक रिपोर्ट में मौजूद ये गंभीर विसंगतियां यह साबित करती हैं कि हथियार और गोली के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिशें विफल रही हैं। चूंकि राम रहीम की दोषसिद्धि का एक बड़ा आधार यही बैलिस्टिक साक्ष्य थे, इसलिए बचाव पक्ष ने इन त्रुटियों के आधार पर सजा को रद्द करने की मांग की है।

आजीवन कारावास की सजा काट रहे राम रहीम

सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में राम रहीम फिलहाल आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। उन्होंने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की है। वर्तमान में वे सुनारिया जेल में बंद हैं और इस ताजा कानूनी पैंतरेबाजी ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में नई कानूनी उलझनें पैदा कर दी हैं।

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