हरियाणा के कई जिलों में इन दिनों रसोई गैस (LPG) की किल्लत ने जनजीवन को बुरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। शुक्रवार सुबह से ही भिवानी, रेवाड़ी, गुरुग्राम और रोहतक जैसे प्रमुख शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी कतारें देखी गईं। हालात इतने बेकाबू हो गए कि रेवाड़ी में सिलेंडर वितरण के दौरान मचे हंगामे को शांत करने के लिए पुलिस प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
घर-घर किल्लत बढ़ी
गैस की आपूर्ति बाधित होने से सबसे ज्यादा परेशानी गृहिणियों को हो रही है। भिवानी की रिंकी ने बताया कि बुकिंग के बावजूद हफ्तों तक सिलेंडर घर नहीं पहुंच रहे हैं। मजबूरी में उन्हें अपने बीमार परिजनों को घर पर अकेला छोड़कर खुद घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है। रेवाड़ी के आनंद ने बताया कि वह दो दिन से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन स्टॉक खत्म होने की बात कहकर उन्हें लौटा दिया जाता है। इस संकट के बीच केंद्र सरकार ने राहत के तौर पर हरियाणा को 8.76 लाख लीटर केरोसीन तेल आवंटित किया है, ताकि वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।
गुरुग्राम के गर्ल्स हॉस्टल में चूल्हे में पक रहा खाना
डिजिटल युग के इस दौर में गैस संकट ने छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं को पुराने समय की याद दिला दी है। गुरुग्राम के सेक्टर-38 स्थित एक गर्ल्स हॉस्टल का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हो रहा है, जिसमें गैस न होने से हॉस्टल की मैस में चूल्हे पर खाना पकते दिखाया गया है। हॉस्टल में रहने वाली प्रियंका के मुताबिक अब खाना बनाने के लिए लकड़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है। साथ ही बाजार में इंडक्शन चूल्हों की मांग अचानक बढ़ गई है, जिससे दुकानदारों ने इनके दाम भी बढ़ा दिए हैं।
शादियों के सीजन में हलवाइयों की मुसीबत बढ़ी
शादियों के सीजन में कॉमर्शियल एलपीजी की किल्लत ने बैंकेट हॉल संचालकों और कैटरर्स की नींद उड़ा दी है। अकेले पानीपत में 50 से अधिक बड़े मैरिज पैलेस हैं, जहां रोजाना हजारों लोगों का खाना तैयार होता है। आपूर्ति ठप होने के कारण अब यहां आधुनिक भट्ठियों की जगह लकड़ी और कोयले की भट्ठियों ने ले ली है।
पानीपत के एक हलवाई ने बताया कि एक बड़ी शादी में कम से कम 15-20 कॉमर्शियल सिलेंडरों की खपत होती है, लेकिन आजकल बमुश्किल 5-6 ही उपलब्ध हो पा रहे हैं। नतीजा यह है कि जो खाना गैस पर 4 घंटे में तैयार हो जाता था, उसे लकड़ी की आग पर पकाने में अब पूरा दिन लग रहा है। इसके अलावा धुएं से कारीगरों की सेहत पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।
मुरथल के ढाबों पर बदला कुकिंग का तरीका
हाईवे किनारे स्थित मुरथल के नामी ढाबों ने भी गैस संकट से निपटने के लिए अपनी कार्यशैली बदल दी है। रेशम ढाबा प्रबंधन ने कहा कि गैस का उपयोग 70 प्रतिशत तक कम कर दिया है। अब दाल मखनी, कढ़ाई पनीर और मिक्स वेज जैसी ग्रेवी वाली डिशेज लकड़ी और कोयले की भट्टियों पर बनाई जा रही हैं। गैस का इस्तेमाल केवल रोटियां और परांठे सेकने जैसे जरूरी कामों के लिए ही सीमित कर दिया गया है।
ढाबा संचालकों के सामने चुनौतियां
मुरथल ढाबा एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंजीत सिंह ने बताया कि बड़े ढाबों ने तो वैकल्पिक इंतजाम कर लिए हैं, लेकिन छोटे ढाबा संचालक पूरी तरह पिछड़ रहे हैं। कई ढाबों ने भारी संख्या में इंडक्शन चूल्हे खरीदे हैं, हालांकि कॉमर्शियल बिजली की ऊंची दरों के कारण यह विकल्प भी काफी महंगा साबित हो रहा है।
तमाम मुश्किलों के बावजूद, ढाबा संचालकों ने फिलहाल अपने मेन्यू और कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। उनका कहना है कि वे ग्राहकों की सुविधा को प्राथमिकता दे रहे हैं और अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं कि सेवा निरंतर बनी रहे। हालांकि, अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो खाद्य सेवाओं की लागत बढ़ना तय है।
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