Delhi High Court: झूठे दुष्कर्म के आरोपों की पीड़ा के घाव जिंदगी भर नहीं भरते...दिल्ली हाईकोर्ट

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दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई करते वक्त कहा कि झूठे दुष्कर्म के आरोपों की पीड़ा ठीक उसी तरह होती है, जैसे यौन उत्पीड़न के वास्तविक मामलों में पीड़िता की गरिमा को चोट पहुंचती है।

Delhi High Court : दिल्ली हाईकोर्ट ने झूठे दुष्कर्म आरोपों के गंभीर परिणामों पर जोर देते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में आरोपी को प्रतिष्ठा की हानि, कारावास, सामाजिक कलंक और मानसिक पीड़ा जैसे घाव मिलते हैं, जो जीवनभर नहीं भर पाते। यह पीड़ा वास्तविक यौन उत्पीड़न पीड़ितों की तरह ही गहरी होती है।

मामले की पृष्ठभूमि

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा दिल्ली पुलिस द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई कर रही थीं, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें तीन आरोपियों को बरी कर दिया गया था। एक महिला ने इन तीन पुरुषों पर नौकरी का लालच देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। हालांकि मुकदमे के दौरान महिला ने अपने पुराने बयानों से मुकरते हुए स्वीकार किया कि वह आरोपियों में से एक के साथ स्वेच्छा से संबंध में थी और उसे किसी ने मजबूर नहीं किया। इसके बाद निचली अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर के आदेश में कहा, “जिस आरोपी को झूठे आरोपों में फंसाया जाता है, उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान, कारावास,सामाजिक कलंक और मानसिक पीड़ा ऐसे घाव छोड़ सकते हैं जो जीवनभर नहीं भर सकते। ये पीड़ा ठीक उसी तरह है जैसे यौन उत्पीड़न के वास्तविक मामलों में पीड़िता की गरिमा को चोट पहुंचती है।” कोर्ट ने आगे कहा कि किसी दबाव या मजबूरी के बिना बयान को बाद में पूरी तरह बदल दिए जाने से गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं, जिन्हें संवैधानिक अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती। ऐसा इसलिए क्योंकि न सिर्फ कथित पीड़िता के लिए, बल्कि आरोपी व्यक्तियों और उनके परिवारों के लिए भी दुष्कर्म के आरोपों के दूरगामी परिणाम होते हैं।

सच्ची शिकायतों पर असर

हाईकोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह की झूठी शिकायतें आम लोगों के मन में संदेह और झिझक पैदा करती हैं,जिससे सच्ची शिकायतों को भी शक भरी नजर से देखा जाने लगता है। जस्टिस शर्मा ने कहा,“जब गंभीर आरोप लगाए जाते हैं और फिर बिना किसी स्पष्टीकरण के वापस ले लिए जाते हैं,तो इससे यौन हिंसा के पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाई गई प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कम होता जाता है। इसका दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह होता है कि जिन महिलाओं से वास्तव में ऐसे अपराध किए गए हैं,उनकी आवाज पर सवाल उठाए जा सकते हैं या फिर उनकी पीड़ा पर संदेह किया जा सकता है।”

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