Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने मनीष सिसोदिया की जीत पर लगाई ' पक्की मुहर', पढ़िये पूरा मामला

Manish Sisodia
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आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया। 

दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने 2020 के विधानसभा चुनाव में पटपड़गंज सीट से जीत हासिल की थी। इस जीत को रद्द करने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई। अब हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया है। जानिये वजह?

दिल्ली हाईकोर्ट ने शनिवार को आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया की अर्जी पर सुनवाई की। दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया की पटपड़गंज विधानसभा सीट से 2020 के चुनाव में मिली जीत को रद्द करने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया कि इसमें तथ्यों का पूर्ण अभाव है और कानूनी रूप से एक भी मान्य आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 11 के तहत याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज करने के लिए प्रतिवादी के आवेदन को स्वीकार कर लिया। बता दें कि यह याचिका प्रताप चंद्र ने दायर की थी। उन्होंने 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा था। उन्हें पटपड़गंज विधानसभा सीट से महज 95 वोट मिले थे।

उन्होंने अपनी अर्जी में आरोप लगाया था कि आप उम्मीदवार मनीष सिसोदिया ने मौन अवधि के दौरान लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सिसोदिया ने अपने नामांकन हलफनामे में आपराधिक पृष्ठभूमि को भी छिपाया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि याचिका में अधिनियम की धारा 83 के तहत अपेक्षित आवश्यक तथ्यों का उल्लेख किए बिना सामान्य और अस्पष्ट कथन शामिल थे।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने अवैध प्रचार के आरोप साबित करने के लिए जो तस्वीरें पेश की, उसमें पार्टी के चिन्ह और नाम वाले सामान्य पार्टी होडिंग्स शामिल थे। इन तस्वीरों में मनीष सिसोसिया का कोई भी उल्लेख नहीं था। न्यायालय ने कहा कि स्थिर पार्टी होर्डिंग्स अपने आप में धारा 126 के तहत प्रचार नहीं हो सकते हैं।

उच्च न्यायालय ने उस दावे को भी खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया कि सिसोदिया ने अपने फॉर्म 26 हलफनामे में एफआईआर का उल्लेख नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 33 ए के तहत खुलासा तभी अनिवार्य है, जब आरोप तय किए गए हों या किसी सक्षम न्यायालय द्वारा संज्ञान में लिया गया हो। सिर्फ एफआईआर दर्ज होने से इसका खुलासा करने की बाध्यता नहीं होती है। न्यायालय ने तमाम दलीलों के आधार पर निष्कर्ष निकाला की इस याचिका पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई का कोई आधार नहीं बनता। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस चुनाव याचिका को खारिज कर दिया है।

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