Aravalli Ridge: अरावली रिज में सड़क बनाएगा DDA, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांगी परमिशन

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सुप्रीम कोर्ट में DDA ने दायर की याचिका। 

Aravalli Ridge: DDA ने अरावली रेंज एरिया में सड़क बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

Aravalli Ridge: दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से अरावली रेंज एरिया में सड़क बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका के माध्यम से DDA ने 473 पेड़ों को काटने या दूसरी जगह शिफ्ट करने और छोटे पौधों को हटाकर दूसरी जगह पर लगाने की परमिशन मांगी है।

यह सड़क केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल चिकित्सा विज्ञान संस्थान (CAPFIMS) केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए बने अस्पताल तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई जाएगी।

DDA ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी परमिशन

DDA के मुताबिक, सड़क बनाने के लिए मॉर्फोलॉजिकल रिज के 0.79 हेक्टेयर क्षेत्र में काम किया जाएगा, वहीं कुल 2.97 हेक्टेयर वन भूमि के इस्तेमाल की परमिशन मांगी गई है। प्राधिकरण का कहना है कि पहले इस परियोजना के लिए 3.6 हेक्टेयर वन भूमि प्रस्तावित थी, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के प्रयासों के तहत इस जरूरत को कम किया गया है।

DDA ने आगे कहा कि पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के तौर पर द्वारका के धूलसिरास इलाके में 3.68 हेक्टेयर भूमि पर नए पेड़ों को लगाया जाएगा। प्राधिकरण का दावा है कि परियोजना को इस तरह डिजाइन किया गया है ताकि कम से कम वन एरिया प्रभावित हो, इसके साथ ही हरित आवरण का संतुलन खराब न हो।

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा का मुद्दा

बता दें कि इससे पहले 29 दिसंबर को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने निर्देशों पर स्टे लगा दिया था। कोर्ट का कहना था कि यह एक संवेदनशील मुद्दा है, जिस पर स्पष्टता बहुत जरूरी है, क्योंकि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणियों की अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। मामले को लेकर सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने की है, जिसमें जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एजी मसीह भी शामिल हैं।

कोर्ट अब अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा के मुद्दे को लेकर 21 जनवरी को सुनवाई करेगा। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि जब तक एक नई उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति नहीं बन जाती, तब तक पहले की समिति की सिफारिशें और कोर्ट के पुराने निर्देशों को लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट का कहना है कि अंतिम फैसले से पहले वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक पहलुओं की गहनता से समीक्षा जरूरी है।

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