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राजनांदगाव। एबीस एक्सपोर्ट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने जस्सी प्रॉपर्टीज एंड कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड को तक़रीबन 9 करोड़ रुपये की फिश और श्रीम्प फ़ीड सप्लाई किए थे। तक़रीबन 10 वर्ष तक चले व्यापार के बाद जस्सी प्रॉपर्टीज एंड कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड ने उनका बकाया देने से मना कर दिया। जिसके बाद कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने बकाया राशि भुगतान न कर पाने पर दिवालिया घोषित कर दिया है।
दरसअल, 1 मार्च को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल कोलकाता बेंच ने नौ करोड़ रुपये का डिफ़ॉल्ट करने के लिए कोलकाता स्थित एक्का फीड कंपनी जस्सी प्रॉपर्टीज एंड कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ इन्सॉल्वेंसी एवं दिवालियापन समाधान प्रक्रिया शुरू करने के लिए आदेश सुनाया था। एबीस एक्सपोर्ट्स जो कि, छत्तीसगढ़ स्थित पोल्ट्री और पशु चारा बनाने वाली दिग्गज कंपनी है। जिसने जस्सी प्रॉपर्टीज एंड कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड को नौ करोड़, इक्यासी लाख, उनहत्तर हजार चार सौ अड़तीस रुपये की फिश और श्रीम्प फ़ीड सप्लाई किए थे। याचिका वर्ष 2020 में एबीस एक्सपोर्ट्स का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील हसनैन अल्वी द्वारा इन्सॉल्वेंसी एवं दिवालियापन संहिता, 2016 की धारा 9 के तहत दायर की गई थी।
2019 में खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
मिली जानकारी के अनुसार, दोनों पार्टियों के बीच वर्ष 2010 से अच्छे व्यापारिक संबंध थे। हालांकि बाद में वर्ष 2019 में, जस्सी ने माल लेने के ऐवज में डिफ़ॉल्ट करना शुरू कर दिया और एबीस एक्सपोर्ट्स को उसके बकाया के लिए क़ानूनी प्रक्रिया में संलग्न कराया। जस्सी प्रॉपर्टीस जो पहले भुगतान कर रहे थे उनकी पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता जोय शाह ने तर्क दिया कि, चूंकि वे सीएंडएफ एजेंट थे और सप्लाई की गई। फ़ीड के अंतिम उपयोगकर्ता नहीं थे और इसलिए वे भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं थे। वहीं ऑपरेशनल क्रेडिटर (एबीस) को अंतिम उपयोगकर्ताओं एवं डीलरों से भुगतान एकत्र करना चाहिए। उन्होंने कई आपत्तियां और मुद्दे जैसे कि पहले से मौजूद विवाद, जो वर्ष 2018 में पार्टियों के बीच इमेल्स में दर्शाये गये हैं। उसका सहारा लेते हुए कहा कि, क्योकि दोनों पार्टियों के बीच विवाद चला रहा है। इसलिए यह केस NCLT के सुनने योग्य नहीं है अर्थात यह सिविल का मामला है जो कि, सिविल कोर्ट के द्वारा निर्धारित किये जाने योग्य है।
एबीस के वकील ने दिया कोर्ट में तर्क
वहीं एबीस एक्सपोर्ट्स की पैरवी करने वाले वकील हसनैन अल्वी ने तर्क दिया कि, सीएडएफ समझौता वर्ष 2015 में समाप्त हो गया था और यहां तक कि, अगर यह मान लिया जाए कि, जस्सी प्रॉपर्टीज एक एजेंट हैं। तो भी वह उनकी देनदारी के दायित्व से उन्हें मुक्त नहीं करता क्योंकि, माल उनके आदेश पर डिलीवर किया गया था। पिछले 10 वर्ष के आचरण से यह साबित होता है कि, लेनदारी और देनदारी केवल जस्सी प्रॉपर्टीज और एबीस एक्सपोर्ट्स के बीच में थी और कोई अन्य तीसरा पक्ष शामिल नहीं था और ना है। इसके अलावा 2018 के ईमेल में दर्शाए गए जस्सी द्वारा उठाए गए सभी विवाद वर्ष 2019 से संबंधित नहीं थे। जिसमें वास्तव में कर्ज देय हुआ था और यह सभी ईमेल्स का उपयोग जस्सी प्रॉपर्टीज द्वारा अपने दायित्व से बचने के लिए केवल दिखावटी विवाद पैदा करने के लिए किया गया है।
एनसीएलटी कोर्ट ने माना विवाद वास्तविक नहीं
एनसीएलटी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय दिया कि, दोनों पार्टियों के बीच लेनदारी और देनदारी का संबंध स्थापित होता है। एबीस एक्सपोर्ट के परिचालन बकाया को चुकाने में जस्सी प्रॉपर्टीज द्वारा स्पष्ट चूक की गई है। वहीं जस्सी प्रॉपर्टीज द्वारा उठाए गए सभी विवाद वास्तविक नहीं है और केवल कानून से बचने के लिए मनगढंत रूप से उठाए गए थे।
सौमित्र लाहिड़ी को अंतरिम समाधान पेशेवर के रूप में किया नियुक्त
जिसको लेकर एनसीएलटी ने याचिका स्वीकार कर ली और जस्सी प्रॉपर्टीज पर नियंत्रण लेने के लिए सौमित्र लाहिड़ी को अंतरिम समाधान पेशेवर ("आईआरपी") के रूप में नियुक्त किया। इस आदेश और आईआरपी की नियुक्ति के साथ जस्सी प्रॉपर्टीज के निदेशक मंडल की सभी शक्तियां और कंपनी का परिसमापन कर दिया जाता है। जस्सी प्रॉपर्टीज तब तक निलंबित रहेंगी जबतक आईआरपी को कंपनी का खरीदार मिल जाता है या लेनदारों के कर्ज की वसूली नहीं हो जाती।
