ऐसी परंपरा : यज्ञ की राख से खेलेंगे होली, तीन दिन पहले शुरु हुआ ब्रह्म यज्ञ

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मैनपुर विकासखण्ड एक गांव में होती है अनोखी गौ पूजा, गायों को स्वयं पर चलाने की परंपरा।

हसन खान - मैनपुर। छत्तीसगढ़ के एक गांव में होली से पहले गौ माता की पूजा होती है। गौसेवा यात्रा, कलश यात्रा, गौ अभिनंदन और फिर ब्रह्म यज्ञ होता है। यज्ञ के समापन के बाद राख से होली खेली जिस पर जाती है। होली के पहले अनुष्ठान में गौ माता के रास्ते पर सूती कपड़ा बिछाया जाता है, गौ माता चलती है। भक्त गौ माता की राह में पेट के बल लेट कर उनके पांव अपने शरीर में लेते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से रोग व्याधि से मुक्ति मिलती है और शुक्रवार से यहां होली का पर्व प्रारंभ भी हो गया है। गरियाबंद के विकासखंड मैनपुर के खजूरपदर गांव में कांडसर गौशाला में होली के 5 दिन पहले गौसेवा पर आधारित मेला लगता है। कांडसर गौ सेवा केंद्र के गौसेवक बाबा उदयनाथ ने 16 साल पहले विश्व शांति ब्रम्ह यज्ञ किया था। तब से होली के 4 दिन पहले हर साल इस यज्ञ की शुरूआत होती है।

चार किलोमीटर सफेद सूती वस्त्र में गौ माता करती है भ्रमण

गौ माता की पूजा-अर्चना के बाद यज्ञ शुरू होने से पहले गौ वंश को कांडसर गौशाला से मुख्य बस्ती तक लगभग 4 किलोमीटर का भ्रमण कराया जाता है। बाबा के अनुयायी गौ माता के जयकारे लगाते हुए गाजे-बाजे के साथ गांव भ्रमण पर निकलते हैं। गौ माता की राह में गांवभर में सूती कपड़े बिछाया जाता है। इसी कपड़े पर गौवंश चलते हैं। जगह-जगह गौ वंश का स्वागत पूजा अर्चना के साथ किया जाता है। ऐसे भी भक्त होते हैं जो गौ माता की राह में पेट के बल लेट कर उनके पांव अपने शरीर में लेते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से रोग व्याधि से मुक्ति मिलती है।

गौ माता की सेवा और आस्था को बढ़ाना

बाबा उदयनाथ ने हरिभूमि से चर्चा करते हुए बताया कि इस आयोजन का मकसद गौ वंश की रक्षा व उसके प्रति आस्था को बनाए व बढ़ाये रखना है। गौवंश कि सेवा मले ही कठिन है, लेकिन फलदाई है। बदलते जमाने में लोग अन्य पालतू जानवर पालने में अपनी शान समझते हैं। ऐसे लोगों को गौ पालन के महत्व को समझाने के लिए यह आयोजन किया जा रहा है। साल दर साल भक्तों की लगने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोगों का रुझान गौ सेवा के प्रति बढ़ रहा है।

पलाश, चमगादड, गुबरेल कार्यक्रम में मुख्य अतिथि

अलेख ब्रम्ह उपासक बाबा उदयनाथ द्वारा संचालित कांडसर स्थित गौ शाला में मनाए जाने वाली अनूठी ही नहीं, प्रकृति प्रेम जगाने वाली होली की शुरुवात 22 मार्च को अतिथि सत्कार के साथ हो गई है। हालांकि फागुन की नवमीं तिथि से गौ भ्रमण की शुरुवात हो जाती है। होलिका दहन के तीन दिन पूर्व शुरू होने वाले यज्ञ में भ्रमण कर लौटने वाली गाय अतिथि होती हैं । इनके साथ तीन और अतिथि का चयन होता है, जिन्हें तीन दिवस तक मुख्य मंच पर विराजमान किया जाता है। इस बार की यह तीन अतिथि पलाश वृक्षराज, चमगादड पक्षीराज, गुबरेल मृग को बनाया गया। शुक्रवार को 03 अतिथियों का भव्य स्वागत किया गया।

गौ अभिनंदन से शुरू हुआ यज्ञ

इस वर्ष 22 मार्च शुक्रवार को कलश यात्रा व गौ अभिनंदन से यज्ञ की शुरुआत हुई है। इसमें 23 मार्च ब्रम्ह मूहुर्त सुबह पांच बजे से यज्ञ प्रारंभ, जो 24 मार्च रविवार यज्ञ सतत जारी रहेगा। 25 मार्च को होली पर्व के अवसर पर पूर्ण आहूती, बाल भोग अर्पण और हवन कुंण्ड के राख से होली का तिलक लगाकर होली खेलेंगे तथा गौ पुजा के साथ कार्यक्रम का समापन होगा। गौ काष्ठ व विभिन्न औषधियों को हवन कुंड में डाला गया है। बाबा उदयनाथ व उनके अनुयायी ब्रह्म मुहूर्त से देर रात तक निराकार ब्रम्ह के उपासक विधि अनुसार हवन कर रहे हैं। भजन कीर्तन के साथ गौ का महत्व बताया जाता है। यज्ञ का होली खेलने की शुरुआत किया गया था, बाबा उदय नाथ बताते है कि शुरुवात में केवल उनके अनुयायी जिनकी संख्या उस समय 2 हजार थी, वही आते हैं। अब दूर दराज से लोगो की भीड़ व 15 हजार से भी, ज्यादा अनुयायी यज्ञ में जुटेंगे। बाबा उदयनाथ ने बताया कि, स्वागत के मूख्य मंच में देर रात तक भजन कीर्तन चलेगा, गौरीशंकर सिरफिरा ने कहा कि ऐसे आयोजन से सनातन धर्म का प्रचार तो होता ही है. प्रकृति जो हमे सब कुछ देती है, उसका भी हमें सम्मान करना चाहिए यही सीख मिलता है। गौ पग बाधा, दूर करती है रोग व्याधि- इस पूरे आयोजन में गौ पग बाधा बनने का रिवाज भी प्रमुख माना गया है। मान्यता है कि भ्रमण से लौट कर आने वाले गौ माता के रास्ते में लेट कर जो व्यक्ति गौ पम बाधा बनते है। जिनके शरीर से गौ माता पार हो कर गुजरती है उनकी शारीरिक कष्ट दूर हो जाता है। इसी मान्यता के चलते स्थानीय लोगों के अलावा दूर दराज से आए लोग गौ के रास्ते मे लेट जाते है। अब तक किसी भी श्रद्धालु को गौ चलने से नुकसान न होना इसकी सत्यता को भी प्रमाणित करता है।

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