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यशवंत गंजीर-कुरुद। कुरुद के वृद्धि विहार भरदा चौक में आयोजित गौरीशंकर शिवमहापुराण कथा सुनने तीसरे दिन व्हीआईपी पास वालो की रेलमपेल देखने को मिली। लेकिन कथा पंडाल में वहीं दिखा जिसे हरिभूमि में हमने पहले ही प्रकाशित कर दिया था। आयोजक परिवार के लिए आरक्षित जगह को छोड़कर जो पहले कथा पंडाल पहुंचा उन्हें ही व्यासपीठ के नजदीक में बैठने को स्थान मिला।
शनिवार को कथा के तीसरे दिन करीब सवा लाख श्रद्धालु शिव कथा सुनने कुरुद पहुंचे थे। जिनमें क्षेत्र के बड़ी संख्या में महिला-पुरुष व्हीआईपी पास लेकर सामने में जगह पाने पंडाल व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों एवं बाउंसरों से जी-हुज्जत कर रहे थे। यह स्थिति कथा वाचक के व्यासपीठ में विराजमान हो जाने के बाद भी बनी हुई थी। सेवा में लगे कार्यकर्ता ही अपने परिवार के सदस्यों को लाकर ऐसी स्थिति निर्मित कर रहे थे। जिसे देख कथा के दौरान कथावाचक प्रदीप मिश्रा को कहना पड़ा कि झुकना जिंदा की पहचान है और अकड़ना मुर्दे की। व्हीआईपी कल्चर छोड़कर आपको जहां जगह मिल रही है वहीं बैठकर कथा सुनने आप और हम भले एक दूसरे को न देख पा रहे हो लेकिन महादेव पर सबकी नजर है। कथा के दौरान प्रदीप मिश्रा ने कहा कि अब दूनीया के लोग हमें टोटका वाला महराज कहता है। लेकिन ये टोटका नही दुःख हल करने का उपाय है। एक उपाय और करना जिनके पास खुद का घर नही है वे अपने आसपास के पांच बेलपत्र के पौधे या वृक्ष की छः माह तक सेवा करने से माता लक्ष्मी व महादेव की कृपा मिलती है। घर-परिवार की समृद्धि होती है इसलिए यह उपाय करके देखना।
पैसा भले कम हो पर संस्कारो में दम हो
पंडित मिश्रा ने अपनी बात बताते हुए कहा कि मैं गरीबी में पला- बढ़ा हूं। मेरे माता-पिता के पास पैसे कम होते थे पर उनके संस्कारो में कभी कमी नही रही। उन्होंने मुझे ऐसा संस्कार दिया जिसके बदौलत ही आज मैं इस व्यासपीठ पर बैठ पा रहा हूँ। आप सब भी अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दीजिए, पैसों की कमी होगी तो भी जीवन जिया जा सकता है लेकिन अगर संस्कारो में कमी रह गई तो वह जिंदगी बेकार हो जाती है। उन्होंने कथा और कथा स्थल का महत्व बताते हुए कहा कि सभी शिवभक्तों दो चीजे करना कभी नही छोड़ना चाहिए। कथा श्रवण करना और कथा स्थल की रज( धूल) माथे पर लगाना। ऐसे करने से जीवन सार्थक हो जाता है।
श्रद्धालुओं ने भोजन भंडारे में पैदा की अव्यवस्था
कथा स्थल के समीप ही बाहर से पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए भोजन-प्रसादी की व्यवस्था सेवादारों द्वारा की गई है। प्रतिदिन 25 से 30 हजार लोगों के लिए सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक भोजन बना- खिलाया जा रहा है। लेकिन तीसरे दिन कथा विराम के बाद बड़ी तादात में पहुंचे श्रद्धालुओं ने अव्यवस्था पैदा कर दी। खाना प्लेट उठा बिना धोएं जहां-तहां रख दिये। पंडाल से बाहर कहीं भी बैठकर खाना खाने लगे और जूठा प्लेट वहीं छोड़ चले गये। सेवादारों के बार बार माईक से अलाउंस करने के बाद भी अनुशासन का परिचय नही दिया। अपने आप मे मग्न ऐसे लोगो के चलते सेवादारो को कतारबद्ध बिठाकर भोजन कराने में असुविधाओं का सामना करना पड़ा।
