खिलाड़ियों की दुर्दशा : कोई ईंट भट्ठे पर मजदूर, कोई सब्जी बेचकर तो कोई पेपर बांटकर चला रहा परिवार

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छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी आर्थिक तंगी से भी जूझ रहे, कहते हैं सरकार ने सुध ली इसकी खुशी। अवार्ड लेने के लिए रायपुर आने तक के पैसे नहीं थे, दोस्तों से उधार लेकर पहुंचे।

ललित राठोड़ - रायपुर। सरकार ने सुध ली, सम्मान दिया और मेडल दिए, इसका सुख है। लेकिन घर सम्मान से नहीं, नौकरी से चलता है। उत्कृष्ट खेल के लिए सम्मान मिलना केवल एक दिन की खुशी देगा। लेकिन हमें रोज परिवार और खुद की चिंता करनी है। नेशनल प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले कई खिलाड़ी मजदूरी करते हैं तो कुछ को खेल के साथ सब्जी बेचने का काम करना पड़ रहा है। घर की जिम्मेदारियों को पूरा करने पेपर बांटने को भी मजबूर है। कुछ ऐसे भी उत्कृष्ट खिलाड़ी मिले जिनके पास रायपुर आने तक के पैसे नहीं थे। वे दोस्तों से उधार लेकर रायपुर पहुंचे। हरिभूमि से बातचीत में खिलाड़ियों ने बताया कि नेशनल लेवल में मैडल हासिल करने के बाद भी हमारे पास नौकरी नहीं है।अलंकरण समारोह में शामिल होने के लिए पैसे भी नहीं थे। सम्मान मिलने के बाद कल से फिर हमें अपने काम पर लौटना है। कुछ खिलाड़ियों का परिवार आर्थिक तंगी से भी जूझ रहा है। कभी खेत तो कभी ईट भट्टा में मजदूरी, रायपुर आने के लिए भी उधार लिए रुपए तलवारबाजी में कांस्य पदक हासिल कर चुके रायगढ़ स्थित मैनपुरी के विजेंद्र सिन्हा खेल के साथ-साथ कभी खेती तो कभी खेतों में मजदूरी करने को मजबूर है।

खिलाड़ी ने बताया कि, राज्य और नेशनल लेवल में 2 गोल्ड और 3 कांस्य पदक हासिल किया है। जब जानकारी मिली कि खेल सम्मान मिलना है, तो खुशी हुई है। लेकिन गांव से रायपुर आने के लिए पैसे नहीं थी। दोस्तों से पैसे उधार लेकर लोकल ट्रेन से 7 घंटे का सफर कर रायपुर पहुंचा। उनका कहना है खिलाड़ी को जब नौकरी मिलेगी, तभी उनके खेल का सम्मान होगा। ग्रामीण क्षेत्र में एक खिलाड़ी केवल खेल और पढ़ाई नहीं कर पाता है। माता-पिता के साथ मैं भी मजदूरी करता हूं, तभी हमारी जरूरतें पूरी होती है। खिलाड़ी का कहना है कि रोज 3 से 4 घंटे खेल को देता हूं, तो वही मजदूरी में पूरा दिन बीत जाता है।

डाइट खर्च के लिए दो सालों से बांट रहा हूं पेपर

बेसबॉल में 2019-20 में उत्कृष्ट प्रदर्शन पर कवर्धा के सुमित बंजारे को मुख्यमंत्री ट्रॉफी अवार्ड दिया गया है। सुमित ने बताया कि 8 सालों से बेसबॉल खेल रहा हूं। चार बार बेसबॉल के नेशनल प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने हरिभूमि एक का मौका मिला है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर होने से घर से खेल और डाइट के लिाए पैसे नहीं मिलते हैं, इसलिए दो सालों से पेपर बांटने का काम करता हूं। इस काम से मुझे 1500 मिलते हैं। 2019 में गुजरात में नेशनल लेवल बेसबॉल प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन दिखाया था, जिसके लिए सम्मान मिला है। यह राशि भी परिवार के जरूरतों पर खर्च हो जाएगी। खिलाड़ी का कहना है कि नौकरी नहीं होने से दिक्कत है। सम्मान मिलने से जीवन में कोई विशेष बदलाव नहीं है, क्योंकि सुबह उठकर फिर मुझे अपने काम पर लौटना है।

घरों में करती हूं काम तब जीवन चलता है

बिलासपुर के खमतराई क्षेत्र से पैरा एथलेटिक खिलाड़ी संगीता निषाद को अलंकरण में नगद पुरस्कार मिला है। बातचीत में बताया कि पैरा एथलिटक में दो गोल्ड मेडल मिल चुके हैं। खेल सम्मान मिलने के बाद भी हमारे जीवन में संघर्ष कम नहीं होगा। घर की आर्थिक कमजोर है। परिवार को जिम्मेदारियों को पूरा करने अपने घर के आस-पास दूसरे के घर का काम करती हूं। इस काम से 2000 मिल जाते हैं। अपने खेल को आगे बढ़ाने के लिए आज समय तो लेकिन पैसे नहीं है। नौकरी नहीं होने से जिम्मेदारियों को बोड़ा बढ़ गया है। उनका कहना है कि खेल से अभी तक कहीं से भी किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है। नौकरी नहीं होने से एक समय के बाद खेल को छोड़ना पड़ सकता है, क्योंकि घर सम्मान से नहीं चल सकता।

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