रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में शुक्रवार को पारित 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026' को लेकर संयुक्त मसीही समाज ने विरोध जताया है। समाज के प्रतिनिधियों ने इस विधेयक को संविधान की उद्देशिका के विपरीत और धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करने वाला बताते हुए कोर्ट में चैलेंज करने की बात कही है। इसके साथ ही संयुक्त मसीही समाज मशाल यात्रा निकालकर विरोध भी जताएगा।
शनिवार को संयुक्त मसीही समाज के प्रमुख एडवोकेट डेरेश्वर बंजारे और प्रभाकर सोनी ने प्रेस वार्ता कर विधेयक को लेकर समाज की आपत्तियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि, संविधान के प्रस्तावना में धर्म की स्वतंत्रता का उल्लेख है, लेकिन उसी के खिलाफ कानून (विधेयक) लाया गया है। इससे ना केवल मसीही बल्कि, अन्य समाज आहत हो सकते हैं।
विधेयक में इस्तेमाल किए गए प्रलोभन शब्द को लेकर उन्होंने कहा कि, इसका स्पष्टीकरण होना चाहिए। इसके अलावा इसमें कहा गया है कि, धर्म का प्रचार- प्रसार ना करें। आप मेरे स्वत: करण को कैसे रोक सकते हैं? हमारी परंपराओं को हमें मानना ही पड़ेगा। यही नहीं अगर किसी का धर्मांतरण कराते हैं, तो उसके ब्लड डोनेशन को लेकर भी क्या लोग आपत्ति करेंगे?
मसीह समाज ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में दी जानकारी
मसीह समाज ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में लिखा कि, छत्तीसगढ विधानसभा के फरवरी- मार्च 2026 सत्र में 'धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026' पारित किया गया है। छत्तीसगढ विधानसभा में पारित किए जाने के पश्चात् विधेयक पर अनुमति के लिए माननीय जज महोदय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इस विधेयक के संबंध में संवैधानिक और न्यायालयीन तथ्य निम्नानुसार हैं।
1. यह संविधान की उद्देशिका के विपरीत और धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करने वाला विधेयक है।
भारत के संविधान की आत्मा उसकी उद्देशिका है। उद्देशिका में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता का उल्लेख है। यह विधेयक संविधान की उद्देशिका में वर्णित इस स्वतंत्रता के विपरीत है और उसका हनन करने वाला है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 में अतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों के माध्यम से अनुच्छेद 25 के तहत् संवैधानिक गारंटी को मान्यता दी है कि, प्रत्येक व्यक्ति को धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता है।
यदि कानून बनाया जाए तो अनुच्छेद 25 के तहत् प्रदत्त धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देने के लिए बनाया जाना चाहिए, किन्तु छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पारित “छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026” अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करने वाला विधेयक है। यह धर्म के आचरण और प्रचार को भी धर्म संपरिवर्तन कहकर प्रतिबंधित करता है।
2. राज्य विधान सभा ऐसे विधेयक को पारित करने में असमर्थ है।
संविधान के अनुच्छेद 246 में संसद द्वारा और राज्य विधान-मण्डलों द्वारा बनाई गई विधियों की विषय-वस्तु वर्णित है। संसद को संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची । में (जिसे संविधान में “संघ सूची” कहा गया है) प्रगणित विषय के संबंध में विधि बनाने की अनन्य शक्ति है। संसद को और किसी राज्य के विधान-मण्डल को भी सूची | में (जिसे संविधान में “समवर्ती सूची” कहा गया है) प्रगणित विषय के संबंध में विधि बनाने की शक्ति है। किसी राज्य के विधान-मण्डल को सूची III में (जिसे संविधान में “राज्य सूची” कहा गया है) प्रगणित विषय के संबंध में उस राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की अनन्य शक्ति है।
इस विधेयक के प्रावधान मूलतः धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित हैं, जिसका संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची ।। “समवर्ती सूची”) या III (“राज्य सूची”) की किसी भी प्रविष्टि से कोई संबंध नहीं है। यह केवल संविधान की सातवी अनुसूची की सूची। “सघ सूची”) की प्रविष्टि 97 (कोई अन्य विषय जो सूची || या III में प्रगणित नही है) के दायरे में ही आ सकता है। अत केवल संसद ही इस विषय पर कोई कानून बनाने के लिए सक्षम है और छत्तीसगढ़ राज्य विधान सभा ऐसे विधेयक को पारित करने में असमर्थ है।
3. 'प्रलोभन' आदि शब्दों का प्रयोग अस्पष्ट एवं भ्रामक है-
इस विधेयक के प्रावधान मे प्रलोभन, बल, कपटपूर्ण साधन और असम्यक असर आदि शब्दों का प्रयोग काफी अस्पष्ट और भ्रामक है।
“प्रलोभन” की परिभाषा में सम्मिलित किया गया है नगद अथवा वस्तु के रूप में कोई दान या परितोषण, चाहे वह नगदी में हो या वस्तु के रूप में हो, या भौतिक लाभ या रोजगार, किसी धार्मिक निकाय द्वारा संचालित विद्यालय में शिक्षा, बेहतर जीवन शैली, दैवीय प्रसाद या उसका वचन या अन्यथा के रूप में किसी प्रलोभन देने का कोई कार्य।
इस परिभाषा के अनुसार अनाथालयो, वृद्धाश्रमो, स्वास्थ्य केन्द्रों, शैक्षणिक संस्थानों और ऐसी अन्य मानवीय सेवाओं के सचालन या सामाजिक सेवा के कार्यों को भी प्रलोभन या जबरदस्ती के रूप में गलत समझा जा सकता है।
बेहतर जीवन शैली (better lifestyle), दैवीय प्रसाद (divine pleasure) या उसका वचन को भी यदि प्रलोभन माना जाएगा तो सवाल उठता है कि, लोग कोई भी धर्म क्यों मानते है, ईश्वर की आराधना क्यों करते है?
ऐसी परिभाषा से न केवल अनावश्यक मुकदमेबाजी हो सकती है बल्कि उससे भेदभाव और भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकाचार के द्वास की आशका भी बढ़ सकती है। लोगों या सस्थाओं द्वारा सामाजिक सेवाओं, मानवीय सहायता या दानशील दृष्टिकोण के माध्यम से लोगों की मदद करना भी धर्मातरण के प्रयास के रूप में गलत समझा जा सकता है। प्रस्तावित अधिनियम में यदि परिभाषाएँ अस्पष्ट हो तो वह तुच्छ मुकदमेबाजी को जन्म दे सकता है, जिससे राज्य के माननीय न्यायालयों में प्रकरणो की संख्या में अवांछित वृद्धि हो सकती है।
मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संविदा का उल्लंघन
4. मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 18 और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संविदा (ICCPR) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करना भी उतना ही प्रासंगिक है, जो विचार, विवेक और धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। जबकि यह विधेयक स्पष्ट रूप से इन अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के भी विपरीत है।
5. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का भी उल्लंघन
इसके प्रावधान अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सवैधानिक गारंटी के साथ-साथ अनुच्छेद 19 के तहत् भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 14 और 19 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन कर सकते हैं। यह प्रस्तावित अधिनियम, वास्तव में, सद्भावनापूर्ण किये गए धर्मार्थ, शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियों को आपराधिक बनाकर अल्पसंख्यक समुदाय को असमान रूप से लक्षित करता है।
6. पूर्व में 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक, 2006' राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित-
पूर्व में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ विधान सभा में 'छत्तीसगढ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक 2006' पारित कर माननीय राज्यपाल के समक्ष विधेयक पर अनुमति हेतु प्रस्तुत किया गया था। तब तत्कालीन माननीय राज्यपाल द्वारा उस विधेयक के सबंध में निहित न्यायालयीन तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखते हुए माननीय राष्ट्रपति को प्रेषित किया गया था, जिसपर माननीय राष्ट्रपति द्वारा अनुमति नहीं दी गई।
7. इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है-
माननीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता National Council of Churches in India द्वारा दायर केस नम्बर 98 of 2026 National Council of Churches in India Versus State of Rajasthan and Ors. में 2 फरवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने केन्द्र सरकार और 12 राज्यों (जैसे राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, खंड, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश) को नोटिस जारी किया गया। मामले को अन्य समान याचिकाओं के साथ क्लब किया गया और तीन जजों की बेच को रेफर कर दिया गया है।
इस याचिका में मुख्य चुनौतियां कानूनों को अस्पष्ट, भेदभावपूर्ण, निजता और धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 14, 21, 25) का उल्लंघन बताते हुए याचिका में दावा है कि ये कानून अल्पसख्यकों (विशेषकर ईसाइयों) के खिलाफ दुरुपयोग हो रहे है, फर्जी शिकायतो से गिरफ्तारियां हो रही है।