Akshaya Tritiya 2026 पर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में पुतरा-पुतरी विवाह की अनोखी परंपरा धूमधाम से निभाई गई। जानिए कैसे बच्चे इस पारंपरिक आयोजन के जरिए संस्कृति और कृषि जीवन से जुड़ते हैं।

बेमेतरा। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में अक्षय तृतीया (अक्ती) के अवसर पर मिट्टी के गुड्डा-गुड़िया यानी पुतरा-पुतरी का विवाह एक प्रमुख और पारंपरिक उत्सव के रूप में धूमधाम से मनाया गया। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जो अब ग्रामीण जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

बच्चों ने सजाया मंडप और निकाली बारात
इस अवसर पर छोटे-छोटे बच्चों ने गुड्डा-गुड़ियों को सजाकर, उन्हें मौर-मुकुट पहनाकर और हल्दी-तेल की रस्म निभाकर विवाह संपन्न कराया। गांवों में बच्चों ने मंडप सजाया, बारात निकाली और गाजे-बाजे के साथ पूरी शादी की रस्मों को निभाया। इस आयोजन में घर के बड़े सदस्य भी बच्चों का उत्साह बढ़ाते नजर आए।

आमंत्रित कर भोजन की व्यवस्था भी की
बच्चों ने न केवल विवाह की रस्में निभाईं, बल्कि आसपास के लोगों को आमंत्रित कर भोजन की व्यवस्था भी की। पूरे आयोजन में पारंपरिक लोक रंग देखने को मिला, जिससे यह आयोजन किसी वास्तविक शादी से कम नहीं लगा।

सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का ज्ञान भी मिला
यह परंपरा बच्चों को खेल-खेल में सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का ज्ञान देने का माध्यम भी है। साथ ही, यह पर्व कृषि संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें ‘माटी पूजन’ के जरिए अच्छी फसल की कामना की जाती है।

गुड्डा-गुड़िया, मोर, मटका से सजी दुकानें
अक्ति तिहार के अवसर पर गांवों के बाजारों में भी रौनक देखने को मिली। मिट्टी के सुंदर गुड्डा-गुड़िया, मोर, मटका और रंग-बिरंगी चुनरियों की दुकानें सजीं, जहां 50 से 150 रुपये तक में ये सामग्री उपलब्ध रही।

संस्कृति और संस्कारों का अनमोल संगम
सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। जहां देशभर में इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है, वहीं छत्तीसगढ़ में इसे ‘अक्ती’ के रूप में मनाते हुए पुतरा-पुतरी विवाह की यह अनूठी परंपरा संस्कृति और संस्कारों को संजोए हुए है।

(छत्तीसगढ़ के जिले, कस्बे और गांवों की खबरों के लिए हरिभूमि का "ई-पेपर" पढ़ें। यहां क्लिक करें "epaper haribhoomi" या प्लेस्टोर से "हरिभूमि हिंदी न्यूज़" App डाउनलोड करें।)