उदंती-सीतानदी में दिखा ‘आसमान का चीता’: दुनिया का सबसे तेज़ उड़ने वाला पक्षी पेरेग्रीन फाल्कन फिर पहुंचा छत्तीसगढ़

Fastest Bird Sighting Peregrine Falcon
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उदंती-सीतानदी में शाहीन बाज की वापसी

छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पेरेग्रीन फाल्कन की उपस्थिति दर्ज, वन्यजीव संरक्षण और क्षेत्र की बढ़ती जैव विविधता का मजबूत संकेत।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दुनिया के सबसे तेज़ उड़ान भरने वाले पक्षी पेरेग्रीन फाल्कन (शाहीन बाज) की मौजूदगी फिर से दर्ज की गई है। क्षेत्र में इसके दिखने को विशेषज्ञ जैव विविधता में हो रहे सकारात्मक बदलाव का संकेत मान रहे हैं।

फिर दिखाई दिया ‘आसमान का चीता’
फाल्कन को उसकी अविश्वसनीय गति के कारण 'स्काई चीता' कहा जाता है। शिकार के दौरान यह ऊँचाई से गिरते हुए लगभग 320 किमी प्रति घंटा की रफ्तार तक पहुँच जाता है, जो इसे दुनिया का सबसे तेज़ उड़ने वाला पक्षी बनाता है।


वन रक्षक ने कैमरे में कैद किया दुर्लभ दृश्य
यह दुर्लभ दृश्य वन रक्षक ओमप्रकाश राव द्वारा कैमरे में कैद की गई। इससे पहले भी आमामोरा ओड़ क्षेत्र के पास शेष पगार जलप्रपात के आसपास ड्रोन सर्वे में इस प्रजाति की उपस्थिति दर्ज की गई थी। बार-बार दिखाई देना बताता है कि यह इलाका इसके लिए अनुकूल habitat बन चुका है।

शिकार की अनोखी तकनीक और व्यवहार

  • विशेषज्ञों के अनुसार यह पक्षी ऊँचाई से सीधी और सटीक गोता लगाकर शिकार पकड़ने में माहिर होता है जिसकी सामान्य उड़ान भी तेज़ होती है।
  • छोटे पक्षी, कबूतर, तोता इसका मुख्य शिकार होता है
  • मजबूत, नुकीले पंजो से ये उड़ते-उड़ते भी कर लेता है पकड़
  • पेरेग्रीन फाल्कन अपनी लाइफ-लॉन्ग पार्टनर वाली प्रवृत्ति के लिए भी जाना जाता है और ये लगभग 12-15 वर्ष तक जीवित रहता है।

जैव विविधता के लिए शुभ संकेत
उदंती-सीतानदी में इस प्रजाति का दिखना स्पष्ट संकेत है कि क्षेत्र का पर्यावरण और food chain मजबूत हो रही है। हाल ही में हुए बर्ड सर्वे में बारनवापारा अभ्यारण्य में भी ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन और ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर जैसे दुर्लभ पक्षी दर्ज किए गए, जो राज्य की बढ़ती जैव विविधता का प्रमाण है।

वन विभाग की सक्रियता से दिख रहे परिणाम
वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पांडेय के नेतृत्व में संरक्षण कार्यों की निरंतर निगरानी की जा रही है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अब दुर्लभ और संवेदनशील प्रजातियों की उपस्थिति लगातार दर्ज हो रही है, जो संरक्षण अभियान की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

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