आंबेडकर अस्पताल में दुर्लभ सर्जरी: ब्रश करते वक्त फटी गर्दन की नस, रायपुर में विश्व का 11वां केस

डॉक्टरों की टीम
रायपुर। शहर में रहने वाले 42 वर्षीय मरीज को किसी तरह की बीमारी और संक्रमण नहीं था। सुबह ब्रश करते वक्त बेवजह उसके गर्दन की नस फट गई और वह बेसुध हो गया। सही समय पर परिजन उसे लेकर आंबेडकर अस्पताल लेकर पहुंचे जहां हार्ट, चेस्ट एंड वैस्कुलर सर्जरी विभाग में ऑपरेशन के बाद उसकी जान बच गई। दावा है कि विश्व में बिना कारण मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली गर्दन की नस फटने की यह 11वीं घटना है। मरीज को लकवा अथवा ब्रेन डेड होने का खतरा था। सही समय पर उपचार के बाद वह स्वस्थ हो गया।
चिकित्सकों का दावा है कि, आमतौर पर शरीर की नस कैंसर के ट्यूमर, किसी संक्रमण अथवा अनुवांशिक कारणों के कारण फटने की घटना सामने आती है। बिना कारण नस का फटना अति दुर्लभ है और मेडिकल जर्नल में इसके 10 केस का उल्लेख है। राजधानी में रहने वाले 42 साल के मरीज के साथ कुछ ऐसा वाकया हो गया। उसे बेहोशी की हालत में आंबेडकर अस्पताल लाया गया था, जहां परिवार वालों ने बताया कि सुबह ब्रश करते वक्त उसके गले में तेज दर्द हुआ और वह बेसुध हो गया।
डॉक्टरों की टीम ने तत्काल सर्जरी की
प्रारंभिक लक्षण के आधार पर उसे सीटीवीएस विभाग भेजा गया। गर्दन की नसों की सीटी एंजियोग्राफी जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि एंजियोग्राफी जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि मरीज की दायीं कैरोटिड आर्टरी (मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली नस) फट चुकी है। उसके चारों ओर गुब्बारानुमा संरचना बन गयी, जिसे कैरोटिड आर्टरी स्यूडोएन्युरिज्म कहा जाता है। आपात स्थिति में आए मरीज को जान का खतरा था, इसलिए डाक्टरों की टीम ने उसकी तत्काल सर्जरी की। लगभग पांच घंटे चली सर्जरी के दौरान बोवाइन पेरिकार्डियम पैच की सहायता से फटी हुई कैरोटिड आर्टरी को अत्यंत सावधानीपूर्वक रिपेयर किया गया।
गले की नस का फटना दुर्लभ
चिकित्सकों के अनुसार सामान्यतः कैरोटिड आर्टरी के फटने की घटनाएं एथेरोस्क्लेरोसिस, ट्रॉमा, कनेक्टिव टिश्यू डिसऑर्डर, संक्रमण या ट्यूमर से ग्रस्त मरीजों में देखी जाती हैं, लेकिन यह मरीज पूरी तरह स्वस्थ था। अपने आप कैरोटिड आर्टरी का फटना चिकित्सा जगत में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। कैरोटिड आर्टरी गर्दन के दोनों ओर स्थित प्रमुख धमनी होती है, जो हृदय से मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह सुनिश्चित करती है। इसके क्षतिग्रस्त होने पर मरीज की जान को तत्काल खतरा होता है।
हर पल था जोखिम
हार्ट, चेस्ट एंड वैस्कुलर सर्जरी विभागाध्यक्ष एवं सर्जन डा. कृष्णकांत साहू ने बताया कि ऑपरेशन अत्यंत जोखिमपूर्ण था। गर्दन में खून के अत्यधिक जमाव के कारण धमनी को पहचानना बेहद कठिन था। जरा सी चूक से मरीज की जान जा सकती थी या ऑपरेशन के दौरान मस्तिष्क में खून का थक्का पहुंचने से लकवा या ब्रेन डेड होने का खतरा था। मरीज और परिजनों को सभी जोखिमों की जानकारी देकर सर्जरी की सहमति ली गई। उन्होंने बताया कि आमतौर पर ऐसी घटना होने के बाद रिकव्हरी के चांस बेहद कम होते हैं।
इनका रहा योगदान
इस दुर्लभ सर्जरी को पूरा करने में सीटीवीएस सर्जन डा. कृष्णकांत साहू का साथ कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. संकल्प दीवान, डॉ. बालस्वरूप साहू, जूडा डॉ. आयुषी, डॉ. अंशिका, डॉ. ख्याति, डॉ. आकांक्षा साहू, डॉ. संजय, डॉ. ओम प्रकाश, नर्सिंग स्टाफ राजेन्द्र, नरेन्द्र, चोवा, दुष्यंत, मुनेश, नुतन, प्रियंका, शीबा तथी टेक्नीशियन स्टाफ भूपेन्द्र, हरीश ने दिया। चिकित्सा महाविद्यालय के डीन डॉ. विवेक चौधरी एवं मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. संतोष सोनकर ने इसके लिए पूरी टीम को शबाशी दी है।
