एक एकड़ जमीन ने संवारा बेटियों का भविष्य: आनंद के दान की जमीन पर बना कॉलेज भवन, तब खुली सपनों की राह

एक एकड़ जमीन ने संवारा बेटियों का भविष्य : आनंद के दान की जमीन पर बना कॉलेज भवन तब खुली सपनों की राह
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बस्तर संभाग का इलाका आज भी शिक्षा के लिहाज से पिछड़ा माना जाता है। ऐसे में बीस साल पहले हालात कैसे रहे होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

गौरव श्रीवास्तव - कांकेर। बस्तर संभाग का इलाका आज भी शिक्षा के लिहाज से पिछड़ा माना जाता है। ऐसे में बीस साल पहले हालात कैसे रहे होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। कांकेर जिले का नरहरपुर ब्लॉक-जो जिला मुख्यालय से महज 35 किलोमीटर दूर है-आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां उस दौर में स्कूल के बाद लड़कियों की पढ़ाई लगभग थम जाया करती थी। वजह साफ़ थी-इलाके में कोई कॉलेज नहीं था, और ग्रामीण परिवार अपनी बेटियों को 35 किलोमीटर दूर पढ़ने भेजने से डरते थे। इसका असर सीधे बेटियों के भविष्य पर पड़ता था। पढ़ाई अधूरी रह जाने के कारण न तो उन्हें बेहतर अवसर मिलते थे, न ही विवाह के लिए अच्छे रिश्ते आते थे।

मजबूरी में माता-पिता को कम पढ़े-लिखे लड़कों से बेटियों की शादी करनी पड़ती थी। आनंद साहू के लिए यह सिर्फ़ एक संस्थान नहीं था, यह क्षेत्र की बेटियों का भविष्य था। उन्होंने बड़ा फैसला लिया-नरहरपुर में अपनी एक एकड़ निजी जमीन कॉलेज के लिए दान कर दी। इस फैसले में उनकी पत्नी रूपमणि साहू भी पूरी तरह उनके साथ खड़ी रहीं। जनप्रतिनिधियों और स्थानीय सहयोग से कॉलेज का भवन तैयार हुआ और ठाकुर भाव सिंह कॉलेज के रूप में पढ़ाई का सिलसिला फिर शुरू हुआ। बेटियां जो कभी स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर थीं, उनके लिए अब आर्ट्स और साइंस की शिक्षा का रास्ता खुल गया।


जब एक व्यक्ति ने ठान लिया कि पढ़ाई नहीं रुकेगी
इन हालात को सबसे नजदीक से देख रहे थे क्षेत्र के ग्राम सचिव आनंद साहू। रोजमर्रा की बैठकों में जब भी ग्रामीणों से बातचीत होती, बेटियों की पढ़ाई और रिश्तों की चिंता बार-बार सामने आती। यहीं से आनंद साहू ने ठान लिया कि क्षेत्र में हर हाल में कॉलेज खुलवाया जाएगा। उन्होंने धमतरी की एक निजी शिक्षण संस्था से संपर्क किया और नरहरपुर में कॉलेज शुरू करने के लिए राजी किया। शुरुआत किराए के मकान से हुई, लेकिन अपनी जमीन न होने के कारण कुछ ही वर्षों में कॉलेज बंद होने की कगार पर पहुंच गया।

जहां कभी रिश्ते नहीं आते थे, आज डॉक्टर-इंजीनियर के प्रस्ताव
आनंद साहू बताते हैं कि जिन परिवारों में बेटियों के लिए रिश्ते नहीं आते थे, आज वही बेटियां नौकरी कर रही हैं, आत्मनिर्भर बनी हैं और उनके लिए डॉक्टर और इंजीनियर तक के रिश्ते आ रहे हैं। शिक्षा ने न सिर्फ उनके करियर, बल्कि सामाजिक सम्मान को भी बदल दिया।

अब शासकीय कॉलेज भी, लेकिन कर्ज आज भी याद है
हालांकि नरहरपुर जिला मुख्यालय के पास है, फिर भी वर्षों तक यहां शासकीय कॉलेज की मांग अनसुनी रही। ठाकुर भाव सिंह कॉलेज के कारण पढ़ाई का सिलसिला चलता रहा। आखिरकार 2021-22 में नरहरपुर में शासकीय कॉलेज भी खुल गया, लेकिन आज भी क्षेत्र के लोग मानते हैं कि अगर आनंद साहू ने समय पर एक एकड़ जमीन दान न की होती, तो कई पीढ़ियों का भविष्य अंधेरे में ही रह जाता। आज भी नरहरपुर और आसपास के गांवों में आनंद साहू की दरियादिली मिसाल के तौर पर दी जाती है। यह कहानी बताती है कि विकास सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि संवेदना और साहस से भी आता है।

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