मांड नदी से निकलता है सोना: रोज दर्जनों लोग छानते हैं नदी की बालू, यही उनके जीवन यापन का जरिया

बालू छानकर सोने के कण निकालती झोरा जाति
अजय सुर्यवंशी - जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के फरसाबहार में रहने वाली झोरा जाति अपने अनूठे पारंपरिक पेशे के कारण पूरे देश में जानी जाती है। यह समुदाय आज भी नदियों की बालू छानकर सोने के कण चुनने के काम को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाए हुए है।
पत्थलगांव क्षेत्र के बहनाटांगर में मांड नदी के किनारे प्रतिदिन झोरा समाज के दर्जनों लोग बालू छानने जुटते हैं। कठोर मेहनत के बाद वे रोजाना 500 से 800 रुपये मूल्य तक के स्वर्ण कण निकाल लेते हैं, जिन्हें स्थानीय दुकानों में बेचकर परिवार का खर्च चलाते हैं।
पीढ़ियों से जारी ‘झोरना’
झोरा समुदाय का कहना है कि, उनके पूर्वज सदियों से इसी तरह नदी की बालू से सोना चुनते आए हैं। समुदाय के सदस्य कहते हैं कि, नदी ही हमारा सहारा है। जब तक नदी है, हमारा काम है। दिनभर नदी में मेहनत करते हैं, तब जाकर थोड़ा-बहुत सोना मिलता है, उसी से घर चलता है। स्थानीय बोली में बालू छानकर सोना निकालने की इस प्रक्रिया को ‘झोरना’ कहा जाता है। यही शब्द आगे चलकर इस काम से जुड़े लोगों की पहचान ‘झोरा’ बन गया।
कैसे निकलते हैं सोने के कण?
- झोरा समाज सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करता है।
- विशेष लकड़ी और लोहे के औजारों से नदी की बालू को छाना जाता है
- मिट्टी और महीन रेत को कई बार धोकर अलग किया जाता है
- अंत में तली में बचता है बारीक स्वर्ण कण
समुदाय को नदी के उन स्थानों के बारे में गहरा ज्ञान है जहां सोना मिलने की संभावना रहती है। वर्षों के अनुभव से उन्होंने इसे आजीविका का स्थायी साधन बना लिया है।
कठिन मेहनत, सीमित आय और परंपरा से बंधा जीवन
झोरा जाति के लोग बताते हैं कि उन्हें दूसरा कोई काम नहीं आता। हर दिन सुबह से शाम तक नदी में खड़े होकर बालू छानना उनका रोज का जीवन है। वे कहते हैं कि एक दिन में 500-600 रुपये का सोना निकल जाता है, उसी को बेचकर परिवार चलता है। इनकी मेहनत भले कठिन हो, लेकिन यह परंपरा आज भी उनकी पहचान, सम्मान, और जीविका का आधार बनी हुई है।
