डोंगरगढ़ रीजन में एक और तेंदुए की मौत: वन विभाग ने फिर बताया नेचुरल डेथ, दाह संस्कार की जल्दबाजी और पीएम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हाने पर उठे सवाल

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डोंगरगढ़ में मृत मिला तेंदुआ, जांच पर उठे सवाल

डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र में एक और तेंदुए की संदिग्ध मौत हो गई, जिसके बाद वन विभाग के प्राकृतिक मौत वाले दावे और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

राजा शर्मा - डोंगरगढ़। राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र में एक बार फिर एक तेंदुआ मृत अवस्था में मिला है। रानीगंज क्षेत्र में हुई इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार हो रही तेंदुओं की मौतें और हर बार विभाग द्वारा प्राकृतिक मृत्यु बताकर मामले को रफा-दफा करना, अब स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों की चिंता बढ़ा रहा है।

लगातार मौतें और वन विभाग का एक जैसा दावा
वन विभाग ने इस तेंदुए की मौत का कारण इंटरनल इंजरी बताया है और पोस्टमार्टम के बाद उसका दाह संस्कार कर दिया गया। डीएफओ आयुष जैन ने भी इसे प्राकृतिक मृत्यु माना है। लेकिन सवाल यह उठते है कि, अगर मौत प्राकृतिक थी तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और दाह संस्कार में इतनी जल्दबाज़ी क्यों? एक ही वन क्षेत्र में बार-बार तेंदुओं की मौतें आखिर किस समस्या की ओर इशारा कर रही हैं? डोंगरगढ़ इस समय तेंदुओं के लिए एक डेथ ज़ोन बनता दिख रहा है।

अवैध शिकार या सिस्टम की कमजोरी?
स्थानीय लोगों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में अवैध शिकार, करंट बिछाकर शिकार और जहरीले चारे की संभावनाएं जैसी गंभीर आशंकाएँ मौजूद हैं। इसके बावजूद वन विभाग की गश्त ढीली है और न ही कोई ठोस जांच रिपोर्ट सामने आती है। हर मौत पर वही पुराना बयान प्राकृतिक मृत्यु, लोगों का भरोसा तोड़ रहा है।

हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही तेंदुओं और वन्यजीवों की संदिग्ध मौतों पर सख्त निर्देश दे चुका है। हाईकोर्ट ने कहा था कि, सभी घटनाओं में पारदर्शी जांच हो, अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और वन्यजीव सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए लेकिन डोंगरगढ़ की घटनाएँ बताती हैं कि हाईकोर्ट की सख्ती का जमीनी असर अभी तक नहीं दिख रहा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट न जारी होना और जांच प्रक्रिया में देरी इस बात को और पुख्ता करते हैं।

स्थानीयों की नाराज़गी और चिंताएँ
स्थानीय ग्रामीण और वन्यजीव प्रेमी साफ कह रहे हैं कि विभाग की कमजोर निगरानी, ढुलमुल गश्त और कमजोर इंटेलिजेंस इन मौतों की मुख्य वजह है।उनका कहना है कि अगर स्वतंत्र एजेंसी से जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक, हाईकोर्ट के निर्देशों का ईमानदारी से पालन नहीं हुआ, तो जल्द ही इस क्षेत्र में वन्यजीवों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

प्राकृतिक मौत या सच्चाई की आड़?
तेंदुए की इस ताज़ा मौत ने वन विभाग के दावों की सच्चाई पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह वास्तव में प्राकृतिक मौत है? या फिर हर बार की तरह 'प्राकृतिक मौत' शब्द की आड़ में वास्तविकता को दफन किया जा रहा है? अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि, क्या हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद भी वन विभाग की उदासीनता जारी रहेगी, या फिर इस बार कोई ठोस, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई देखने को मिलेगी?

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