बख्शे गए बड़े अफसर: मातहतों पर फूटा 660 करोड़ के महाघोटाले का ठीकरा, दस महीने से जेल में

मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन
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छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड कार्यालय

घोटाले का मास्टर माइंड सालभर से जेल में है। उसके तीन साथियों की गिरफ्तारी हुई है। पूछताछ के दायरे में आए थे, रीएजेंट और उपकरण खरीदी की आड़ में घोटाला हुआ था।

रायपुर। स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससी की मिलीभगत से अंजाम दिए गए 660 करोड़ के महा घोटाले में अब तक किसी बड़े अफसर पर गाज नहीं गिरी है। घोटाले का ठीकरा हेल्थ डिपार्टमेंट के एक और दवा निगम के चार मैदानी अधिकारियों पर ही फूटा है। जांच एजेंसी द्वारा दस महीने पहले उनकी गिरफ्तारी की गई थी, तब से वे जेल में हैं। इस घोटाले का मास्टर माइंड सालभर पहले बंदी बनाया गया था और उसके तीन साथियों को सोमवार को पकड़ा गया है।

मरीजों को प्राथमिक स्तर के स्वास्थ्य केंद्र में जांच की सुविधा प्रदान करने के लिए अरबो रुपये की जांच मशीन और उससे संबंधित रीएजेंट की खरीदी की साजिश रची गई। घोटाला खुलने के बाद इसकी जांच हुई और पिछले साल जनवरी में महाघोटाले के कर्ता-धर्ता के रूप में मोक्षित कार्पोरेशन के एमडी शशांक चोपड़ा को पकड़ा गया था। इसके बाद मार्च में स्वास्थ्य संचालनालय से जुड़े डाक्टर और दवा निगम के चार अधिकारियों को दबोचा गया।

इनकी गिरफ्तारी के बाद इस बात का अनुमान लगाया जा रहा था कि जांच की आंच विभाग से जुड़े अन्य अधिकारियों पर भी आएगी, जिनकी सहमति के बिना स्वास्थ्य विभाग और दवा निगम में कोई खरीदी नहीं हो सकती। इसके लिए तात्कालीन संचालक स्वास्थ्य सेवाएं और सीजीएमएससी के एमडी को भी पूछताछ के दायरे में लाया गया था। हालांकि उनके द्वारा इस बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से अनभिज्ञता जताई गई थी।

साथ ही मामला खुलने के बाद भी मोक्षित कार्पोरेशन को बड़ी राशि का भुगतान करने के लिए भी सीजीएमएससी के एमडी के साथ एक अन्य अधिकारी पर संदेह जाहिर किया गया था। पूछताछ की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन्हें बख्श दिया गया और घोटाले का ठीकरा गिरफ्तार पांच अधिकारियों और मोक्षित से जुड़े लोगों पर फूट गया। पिछले साल जनवरी और मार्च में गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी अभी जेल में हैं। इस मामले में ईओडब्लू ने सोमवार को मोक्षित कार्पोरेशन के साथ कार्टेल बनाने वाली दो कंपनियों के तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।

8.50 की ट्यूब 2352 में
इस घोटाले में लाम कमाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा गया था। दवा कॉर्पोरेशन के अफसरों ने बाजार में केवल 8.50 पैसे में मिलने वाले ईडीए ट्यूब को 2352 रुपये प्रति नग के हिसाब से खरीदा था। इसी तरह बाजार में पांच लाख रुपए में आने वाली सीबीसी मशीन की कीमत इनके द्वारा 25 लाख रुपए लगाई गई थी। खरीदी की साजिश में जो रीएजेंट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक भेजा गया था, वो उपयोग के बिना रखी-रखी खराब हो गई थी।

कोड का जाल बाकी
घोटाला खुलने के बाद मोक्षित कार्पोरेशन के इंजीनियरों ने कई स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर सप्लाई की गई सीबीसी मशीन को कोडलॉक कर दिया था। इससे संबंधित मशीन उसी कंपनी के रीएजेंट की मोहताज हो गई थी। इन मशीनों में कोड का जाल अभी भी बाकी है, जिसे हटाने के लिए सीजीएमएससी नई एजेंसी से अनुबंध करने के प्रयास में जुटा है। मशीनों का पूरा उपयोग नहीं होने के कारण मरीजों को कई टेस्ट के लिए बड़े अस्पताल के चक्कर लगाना पड़ रहा है।

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