बस्तर विवि में व्याख्यान: आयरलैंड की डॉ. लिडिया बोलीं- यहां का देशज ज्ञान नेचुरल साइंस जितना ही अमूल्य

एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हैब लिडिया गूजी
अनिल सामंत- जगदलपुर। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ आयरलैंड की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हैब लिडिया गूजी ने कहा कि, नेचुरल साइंस की तरह बस्तर का देशज ज्ञान भी अत्यंत अमूल्य है। बस्तर के नृत्य, गायन, कला और परंपराओं में अद्भुत विविधता देखने को मिलती है और यहां की जनजातीय संस्कृति वास्तव में गर्व करने योग्य है। उन्होंने कहा कि भारत में विविध जनजातीय समाज का होना देश के लिए सौभाग्य की बात है।
वे सोमवार को शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान एवं जनजातीय अध्ययनशाला में आयोजित विशेष व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रही थीं। अपने 15 वर्षों के शोध अनुभव साझा करते हुए डॉ लिडिया ने कहा कि बस्तर के जनजातीय जीवन और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच गहरा सहअस्तित्व है।

यहां जनजातीय समाज में पर्यावरण संरक्षण जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है, जहां विविधता के साथ-साथ सामाजिक एकता भी दिखाई देती है। डॉ. लिडिया ने कहा कि, औद्योगिक विकास आवश्यक है, लेकिन विकास के साथ मानवीय मूल्यों और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। बस्तर का समाज शांतिपूर्ण जीवन, सामूहिकता और सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अन्य विद्वानों ने भी रखे विचार
इस अवसर पर इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी, अमरकंटक की प्रो. रंजू हाषिनी साहू ने बस्तर की संस्कृति की विशिष्टताओं और उसमें आ रहे परिवर्तनों पर विचार रखे। वहीं एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, जगदलपुर इकाई के निदेशक डॉ. पीयूष रंजन साहू ने बस्तर की संस्कृति पर प्रभावी लेखन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि, यहां की गोत्र व्यवस्था पारिस्थितिकी से जुड़ी हुई है, जो प्रकृति और संस्कृति के सुंदर समन्वय को दर्शाती है।

स्वागत उद्बोधन विभागाध्यक्ष (मानव विज्ञान) प्रो स्वपन कुमार कोले ने दिया, जबकि आभार प्रदर्शन सह प्राध्यापक डॉ. सुकृता तिर्की ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. गायत्री सोनी ने किया। व्याख्यान में एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक डॉ सुबेंदु पात्रा, ग्रीस से आए शोधार्थी निकोलस पेपेंड्रयू,अतिथि व्याख्याता डॉ सोहन कुमार मिश्रा,डॉ शारदा देवांगन सहित शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।
व्याख्यान के प्रमुख बिंदु
बस्तर का जनजातीय समाज प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का उदाहरण है,जहां पर्यावरण संरक्षण,सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता साथ-साथ विकसित हुई है।औद्योगिक विकास आवश्यक है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ संतुलित विकास ही भविष्य का मार्ग है।
