बलौदा बाजार में गूंजी छेरछेरा की लोकधुन: पौष पूर्णिमा पर पुरे छत्तीसगढ़ ने मनाया अन्नदान और नई फसल का उत्सव

छेरछेरा तिहार में दान देते ग्रामीण
कुश अग्रवाल - बलौदा बाजार। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं में छेरछेरा तिहार एक ऐसा लोकपर्व है, जिसने दान, करुणा और मानवीय संवेदनाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखा है। पौष माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की उदारता और सहभागिता का उत्सव है।
दान, संवेदना और नई फसल का पर्व
छेरछेरा का मूल भाव यह है कि इस दिन कोई भी व्यक्ति किसी भी द्वार से खाली हाथ न लौटे। यही कारण है कि इस पर्व पर अन्नदान को सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। यह त्योहार नई फसल के आगमन और अन्नदाता किसान की महीनों की मेहनत का सम्मान भी है। धान की कटाई, मिसाई और भंडारण के बाद किसान प्रकृति और श्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
#छत्तीसगढ़ में आज पौष पूर्णिमा पर मनाया जा रहा लोकपर्व छेरछेरा, जहां बच्चे टोलियों में घर-घर जाकर दान मांगते हैं और महिलाएँ धान व धन अर्पण करती हैं।@RaipurDistrict #chherchhera #Chhattisgarh #folk pic.twitter.com/uD1gd0AWus
— Haribhoomi (@Haribhoomi95271) January 3, 2026
बच्चों की टोलियाँ और लोकधुन की परंपरा
ग्रामीण अंचलों में बच्चे टोलियाँ बनाकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक धुन में गाते हैं- 'छेरी के छेरा, छेरछेरा, माई कोठी के दान ला, हेरहेरा…' इन शब्दों में केवल दान की मांग नहीं, बल्कि सम्मान, अपनत्व और सामाजिक जुड़ाव की भावना होती है। घरों में चावल, धान, सब्जी या धनराशि दान स्वरूप दी जाती है।
ग्रामीण जीवन की सामूहिकता का प्रतीक
आधुनिकता की तेज गति के बावजूद छत्तीसगढ़ में यह लोकपर्व आज भी पूरी जीवंतता के साथ मनाया जाता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसमें समान रूप से भाग लेते हैं। यह परंपरा बताती है कि समाज की समृद्धि तभी संभव है जब खुशियाँ और संसाधन साझा किए जाएँ।
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित परंपरा
छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि सामाजिक सामरसता, सहयोग और मानवीय मूल्यों को सहेजने का संदेश भी देता है।
