Land for Jobs Case: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को 'जमीन के बदले नौकरी' मामले में सुप्रीम कोर्ट से कोई बड़ी राहत नहीं मिली है। सोमवार (13 अप्रैल) को शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीबीआई (CBI) द्वारा दर्ज की गई FIR और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया। जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मामले की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
निचली अदालत में पेशी से मिली छूट
भले ही कोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी हो, लेकिन लालू यादव के लिए एक राहत की खबर भी आई है। उनकी खराब सेहत और 77 साल की उम्र को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निचली अदालत (Trial Court) की कार्यवाही के दौरान व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दे दी है। अब उन्हें हर सुनवाई पर कोर्ट में हाजिर नहीं होना पड़ेगा।
क्या है 17A का पेच?
लालू यादव की ओर से दलील दी गई थी कि प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 17A के तहत जांच के लिए जरूरी मंजूरी नहीं ली गई थी, इसलिए यह मामला कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें इस मुद्दे को ट्रायल के दौरान उठाने की अनुमति दी है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इसी आधार पर उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि यह धारा 2018 में आई है, जबकि मामला पुराना है।
'जमीन के बदले नौकरी' मामला
यह पूरा मामला साल 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। आरोप है कि मध्य प्रदेश के जबलपुर में रेलवे के ग्रुप-डी पदों पर नियुक्तियों के बदले उम्मीदवारों से जमीन के टुकड़े अपने परिवार के सदस्यों या करीबियों के नाम पर ट्रांसफर करवाए गए थे। सीबीआई इसी घोटाले की जांच कर रही है और इसमें लालू यादव के परिवार के कई सदस्य भी नामजद हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती
लालू यादव ने 24 मार्च को आए दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी FIR रद्द करने की मांग ठुकरा दी गई थी। सीबीआई का स्टैंड रहा है कि तकनीकी आधार पर जांच को रोकना न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालना होगा। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद लालू यादव को कानूनी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा।