आज हनुमान जयंती पर हरिभूमि ने एक ऐसे हनुमान भक्त को तलाशा, जिन्हे एक प्रकार से हनुमानजी का अवतार ही कहा जाता है। वो है 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्में बाबा नीम करौली।

Hanuman Jayanti: देवताओं में पूज्यनीय, अजर अमर देवता हनुमानजी, अंजनी पुत्र और शंकर स्वयं के रूप में जाने जाते हैं और देशभर में पूज्यनीय है। आज हनुमान जयंती पर हरिभूमि ने एक ऐसे हनुमान भक्त को तलाशा, जिन्हे एक प्रकार से हनुमानजी का अवतार ही कहा जाता है। वो है 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्में बाबा नीम करौली।

बचपन में गृह त्यागने वाले बाबा नीम करौली ने कराया 108 हनुमान मंदिरों का निर्माण
दुर्गा प्रसाद शर्मा और राम बेटी के पुत्र बाबा नीम करौली बचपन से ही हनुमान जी को अपना गुरू मानते थे। ऐसा माना जाता है कि बजरंग बली के भक्त होने के चलते उनको कम उम्र में ही कई तरह की दिव्य शक्तियां प्राप्त हो गई थीं, जिस वजह से लोग उनको हनुमान जी का अवतार कहने लगे। बाबा ने छोटी उम्र में ही अपना घर छोड़ दिया था। और इसके बाद कैंची में अपना आश्रम बनाया था। बाबा नीम करौली ने अपने जीवन काल में कई जगहों पर 108 हनुमान मंदिरों का निर्माण कराया था। सितंबर 1973 को वृंदावन में अपने शरीर त्यागने वाले नीम करौली बाबा का एक आश्रम वृंदावन में भी मौजूद है। इस स्थान पर बाबा का आशीर्वाद पाने के लिए बड़ी संख्या में श्रध्दालु पहुंचते हैं। बाबा नीम करौली भारत में ही नहीं विदेशों में भी लोगों के बीच काफी पापुलर रहे हैं।

बाबा ने अपने जीवन में अपने अनुयायियों को दिए कई मंत्र
ऐस कहा जाता है कि महज 17 साल की उम्र में बाबा ने ज्ञान की प्राप्ति कर ली थी। बाबा का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था। लोग बाबा नीम करौली को हांडी वाले बाबा, तिकोनिया वाले बाबा और तलईया बाबा के नाम से जानते थे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दान पुण्य करने के बाद उसका बखान मत करो। बाबा के मुताबिक दूसरों के सामने दान-पुण्य का बखान करने से उसका फल नहीं मिलता है। वहीं उनका कहना था कि कमजोरी या ताकत के बारे में किसी को पता नहीं चलने देना चाहिए, क्योंकि कमजोरी का पता चलने पर लोग आपकी कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं और उसकी तरह अपनी ताकत के बारे में पता चलने पर लोग आपके खिलाफ आसानी से योजना बना सकते हैं।

ऐसे पड़ा बाबा नीम करौली नाम
एक बार बाबा फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में सफर कर रहे थे, जब टिकट चेकर आया तो बाबा के पास टिकट नहीं था। तब बाबा को अगले स्टेशन नीम करौली में ट्रेन से उतार दिया गया। बाबा थोड़ी दूर पर ही अपना चिमटा धरती में गाड़कर बैठ गए। अधिकारी में ट्रेन को चलाने का ऑर्डर दिया और गार्ड ने ट्रेन को हरी झंडी दिखाई, परंतु प्रयास करने के बाद भी जब ट्रेन नहीं चली तो लोकल मजिस्ट्रेट जो बाबा को जानता था, उसने अधिकारी को बाबा से माफी मांगने और उन्हें सम्मान पूर्वक अंदर लाने को कहा। ट्रेन में सवार अन्य लोगों में भी मजिस्ट्रेट का समर्थन किया। अधिकारी ने बाबा से माफी मांगी और उन्हें सम्मान पूर्वक ट्रेन में बैठाया। बचा के ट्रेन में बैठते ही ट्रेन चल पड़ी। तब से बाबा का नाम नीम करौली पड़ गया।

अरेश कॉलोनी में शाम को टहलते थे बाबा नीम करौली
बाबा सितंबर 1970 में अपने पुत्र अनेन सिंह शर्मा के पास मोपाल आए थे, ऐसा भी कहा जाता है कि अरेरा कॉलोनी में अक्सर शाम को बाबा नीम करौली टहलने भी जाया करते थे।