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चाक चौबंद करनी होगी सभी सदनों की सुरक्षा

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है, जहां की विधानसभा में 403 सदस्य बैठते हैं।

चाक चौबंद करनी होगी सभी सदनों की सुरक्षा

उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी के पास पीईटीएन विस्फोटक पाया जाना कोई मामूली सुरक्षा चूक नहीं है। पूरा देश विगत चार दशक से गंभीर आतंकवादी चुनौती का सामना कर रहा है, परंतु ऐसा लगता है कि हमारा सुरक्षा और खुफिया ढांचा बाबा आदम के जमाने में ही जी रहा है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है, जहां की विधानसभा में 403 सदस्य बैठते हैं। साथ लगती विधान परिषद में भी सौ के करीब सदस्य बैठते हैं।

जिस समय सदन चल रहे होते हैं, उस दौरान विधायकों और मंत्रियों के सहायकों और रिश्तेदारों के अलावा सभी विभागों के उच्च अधिकारी भी वहां होते हैं। ऐसे में यदि आतंकवादी संगठन कोई बड़ा विस्फोट करने में कामयाब हों तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां कितनी बड़ी तबाही और त्रासदी हो सकती है। इतने बड़े प्रदेश की सबसे विशाल विधानसभा भवन की सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर है,

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यह जानकार सभी को न केवल आश्चर्य हुआ है बल्कि सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि जो व्यवस्था विधानसभा जैसे संवेदनशील क्षेत्र की भी पुख्ता सुरक्षा करने में सक्षम नहीं है, वह प्रदेश के जन-जन की सुरक्षा क्या करेगी? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सदन में विस्फोटक के संबंध में जो जानकारी दी है, उससे साफ है कि उसे वहां लाकर रखा गया है। किसने रखा है। इसका मकसद क्या है।

क्या किसी विधायक की भी इसमें कोई भूमिका है और अगर है तो क्या हम ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर भेजने लगे हैं, जो न सिर्फ सदनों की पवित्रता को भंग करने पर आमादा हैं बल्कि देश विरोधी गतिविधियों में भी संलिप्त हैं। यह कोई मामूली घटना नहीं है, इसलिए विधानसभा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री के सुझाव पर इसकी जांच एनआईए को सौंपने के निर्देश जारी कर दिए हैं।

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इस षड्यंत्र के पीछे जो भी ताकते हैं, उनका बेनकाब होना जरूरी है। इस समय बजट सत्र चल रहा है। मुख्यमंत्री का कहना है कि विधायकों के अलावा किसी अन्य को सदन में आने की इजाजत नहीं है। ऐसे में मामला गंभीर हो जाता है। विधायकों के अलावा संदेह के घेरे में वहां तैनात कर्मचारी भी हैं, लेकिन जिस तरह की लुंजपुंज सुरक्षा व्यवस्था का जिक्र स्वयं मुख्यमंत्री ने अपने उदबोधन में किया है,

उससे तो लगता है कि विधानसभा परिसर की सुरक्षा को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। 2001 में संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था। उससे पहले तक संसद की सुरक्षा व्यवस्था भी राम भरोसे ही थी लेकिन उस हमले के बाद कई स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था वहां की गई है। अब किसी भी अवांछित का वहां प्रवेश आसान नहीं है। क्या देश का हर सदन संसद जैसे अटैक का इंतजार कर रहा है?

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जब सबको आतंकी खतरे की गंभीरता का आभास शिद्दत से है, तब सुरक्षा को लेकर इस कदर उदासीनता की आखिर क्या वजह है? उत्तर प्रदेश विधानसभा में पीईटीएन जैसे खतरनाक विस्फोटक पाए जाने से साफ है कि आतंकवादी संगठनों के निशाने पर वो सदन हैं, जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बैठकर कानून बनाते हैं और लोकतंत्र की जड़ों को और सुदृढ़ कर बंदूक की नोक पर बातें मनवाने वाली ताकतों को चुनौती देते हैं।

यह सर्वविदित है कि आतंकवाद लोकतंत्र, विकास और अमन के साथ-साथ मानवता के लिए गंभीर चुनौती है। इसे पस्त करने के लिए सिर्फ दृढ़ इच्छाशक्ति से काम चलने वाला नहीं है। वैसी व्यवस्थाएं भी करनी होंगी। सुरक्षा के परंपरागत तौर तरीके से बाहर निकलकर मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर आधुनिक सोच-समझ और अस्त्र-शस्त्रों के साथ चाक चौबंद भी होना होगा।

उत्तर प्रदेश विधानसभा की इस घटना को सबक के तौर पर लेते हुए देश के सभी सदनों की सुरक्षा व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता है ताकि देश के दुश्मन हमारे लोकतंत्र के मंदिरों को निशाना बनाकर अपने मंसूबों में कामयाब होने की कोशिश नहीं कर सकें। ऐसे तत्वों की पहचान करना भी जरूरी है, जो ऐसी ताकतों के हाथों में खेलकर चुने हुए प्रतिनिधियों की सुरक्षा से इस कदर खिलवाड़ करने पर आमादा हैं।

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